(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 231

216 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

चाहिए, हिंदू कानून के अलग-अलग हो हिस्से हैं उनको एक में लाकर गुंथनी चाहिये या नहीं चाहिये यह सवाल नहीं है। मैं आपका ध्यान इस बात पर दिलाना चाहता हूँ कि राउ समिति 20 जनवरी, सन् 1944 को वह समिति बनी और उसने अपना काम शुरू किया और विधेयक का मसौदा बनवाया। वह विधेयक लोगों के सामने 5 अगस्त, 1944 को आया और उसके बाद दो महीने की अवधि दी गई कि 5 अगस्त, 1944 तक, लोग अपनी जो राय हो, उसको भेज दें। और महाशय, मैं यह ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि तीस करोड़ की आबादी के लिये भारत सरकार ने एक हजार प्रतियाँ छपवाई थीं। उसके बाद जब कुछ जोर दिया गया तो तीन हजार और प्रतियाँ छपवाई गयीं।

श्री महावीर सिंह त्यागी (यू.पी.ः सामान्य)ः वे अंग्रेजी में थीं या हिन्दी में?

श्री गोकुलभाई दौलत राम भट्टः वह सभी चार हजार प्रतियाँ अंग्रेजी में थीं। उसके बाद राउ साहब ने प्रांतीय सरकारों से कहा कि उसका अनुवाद छपवा कर बटवाये। वह अनुवाद भी छपा। फिर भी मैं समझता हूँ कि तीस करोड़ की आबादी में 50 से 60 हजार से ज्यादा प्रतियाँ नहीं बंटवाई गइंर्।

अब इस प्रकार का यह विधेयक जो कि इतने महत्व का विधेयक है, जो कि हिंदू समाज को सुदृढ़ करने वाला है जो कि एक प्रकार से नयी हवा को लाने वाली चीज हैं, जो कि एक सुधार करने वाली चीज है, इस सुधार करने वाली चीज के विषय में अभिप्राय जानने के लिये कितने लोगों के पास यह विधेयक पहुंचा और कहां तक इसका प्रचार किया गया, यही मैं बताता हूँ। दो महीने की इसके लिये अवधि रखी गयी और इसके बाद कमेटी ने दौरा किया। उनका दौरा मात्र 36 दिन का था। वे सभी शहरों में नहीं गये, उन्होंने गांवों और कस्बों को छोड़ दिया। वह दौरा करने लोगों के बीच यानी जनता में नहीं गये न ही वह किसी विधवा के पास गये, उससे पूछने के लिए कि फ्बहन, आपको तो बंगाल में दायभाग की प्रथा के अनुसार सम्पत्ति में हिस्सा मिलता रहता है, फिर भी आप दुखी क्यों हो?य् वह मद्रास में नहीं गये जो पूछते कि वहां तो मातृसत्तात्मक समाज के नियमों के तहत सम्पत्ति मिलती है फिर बहनों और लड़कियों को दुःख कैसे हैं? उन्होंने यह पता नहीं लगाया कि क्यों विधवायें बंगाल में ही दुखी हैं या मद्रास में दुखी हैं या कहीं और जगह भी दुखी हैं और अगर किसी और जगह भी दुखी हैं, तो उनके दुखी होने का कारण क्या है? उनका सम्पत्ति में भाग नहीं है इसलिये वह दुखी हैं, मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं हूँ। स्त्री सम्पत्ति न होने से ही दुःखी होती हैं ऐसा नहीं है। एक अड़चन जो थी वह यह थी कि छोटी उम्र में विधवा हो जाती थीं और वे संसार का सुख नहीं भोग पाती थीं। ऐसी विधवाओं को दुबारा शादी करने का मौका क्यों न दिया जाये? इसके लिये ईश्वरचन्द विद्यासागर तथा मलबारी साहब ने कोशिश की और मैं समझता कि सन् 1856 ई. में या पता नहीं कौन-सा साल है, मुझे याद नहीं है, एक विधवा पुनर्विवाह कानून उस वक्त आया और अभी तक चल रहा है। लेकिन मुझे