217
यह भी बताइये कि उसके मुताविक कितने लोगों ने फायदा उठाया और उसके कारण उनके घरों में क्या सुख आ गया और क्या समृद्धि आ गयी? मेरा अर्ज करने का मतलब यह है कि सिर्फ कानून से ही समाज नहीं बदलेगा, कोई चीज आप ऊपर से थोप दें तो उससे कुछ बनने वाला नहीं है। इसके बारे में मैं एक मिसाल देना चाहता हूँ और वह है पारसी मैरिज इण्ड डाइवोर्स विधेयक की। यह विधेयक पहले-पहल सन् 1865 ई. में बना था और उसका संशोधन करने के लिये सन् 1936 ई. में इस विधेयक को को सर कावसजी जहांगीर ने इसी सदन में रखा था। मैं उसका इतिहास बताना चाहता हूँ। वह इतिहास यह है कि पारसी समाज के कुछ मित्रों ने यह सोचा, जैसा कि आज हम लोग सोच रहे हैं, कि संशोधन होना चाहिये। कृपलानी जी अपने घर को खतरे में नहीं डालना चाहते, इसलिये वह जरूर इस विधेयक का समर्थन करेंगे। मैं भी मेरे घर को खतरे में नहीं डालना चाहता, तो क्या इसीलिये मैं इसका समर्थन करूं?
श्री कृष्णचन्द्र शर्मा (यू.पी.ः सामान्य)ः सब बुड्ढे आदमी एक जैसे ही हैं।
श्री गोकुलभाई दौलत राम भट्टः ठीक है, मैं अभी शर्मा जी को जवाब नहीं दे रहा हूँ। वह तो बीवी का कोट लेकर उसके पीछे-पीछे चलते रह सकते हैं।
श्री कृष्णचन्द्र शर्माः लेकिन वह कोट नहीं पहनती है।
श्री गोकुलभाई दौलतराम भट्टः मेरा अर्ज करने का मतलब यह है कि यह पारसी मैरिज इण्ड डाइवोर्स विधेयक जो था उसके बारे में जब कुछ पारसी मित्रों ने सुझाया कि अब आपने सन् 1865 ई. बिल का सुधार करना है, उसे संशोधित करना है, तब उन्होंने क्या किया? उन्होंने यह किया कि अपनी पारसी पंचायत की एक ला-कमेटी बिठाई। इस कमेटी में क्या हुआ? इस कमेटी ने ऐसा नहीं किया कि एक संशोधन विधेयक बना दिया और दो महीने की गुंजाइश दे दी, दो महीने में अपनी राय भेज दीजिये फिर हम अपना निर्णय करेंगे। बल्कि इस कमेटी ने चार साल तक प्रश्नावली भेजी। पारसियों की संख्या कितनी है? एक लाख सन् 1921 की जनगणना के आधार पर, यह ज्यादा से ज्यादा डेढ़ लाख हो सकती है। चार साल तक उस कमेटी की रिपोर्ट उनके सामने रही, बाद में फिर उन्होंने उसे मंजूर किया। यह रिपोर्ट फिर पारसी समाज में परिचालित हुई थी और उस रिपोर्ट पर भी उन्होंने राय मांगी थी, सिर्फ बम्बई वालों की नहीं, सिर्फ अहमदबाद वालों की नहीं, मद्रास में रहने वालों की नहीं, बल्कि परशिया में, चीन में जहां एक-दो पारसी ही कुटुम्ब रहते थे, वहां के लोगों को भी इस रिपोर्ट पर पहले राय मांगी कि आप क्या चाहते हो। पढ़े-लिखे या वकील लोग जो होते हैं, वह एक बात को अपनी वाक्पटुता किसी तरह उल्टा, सीधा भी समझा देते हैं, लेकिन वैसी वाक् शक्ति जिनके पास नहीं है, उनके पास भी यह रिपोर्ट भेजी गई। क्या बहुमत, क्या अल्पमत सबकी राय मांगी गई। और इस तरह सबकी राय लेने के बाद सन् 1936 में यह विधेयक संशोधित