218 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
करके भेजा गया और इस तरह उस विधेयक का विषय 1923 से लेकर सन् 1936 तक सबके सामने रहने के बाद आखिरकार संशोधित रूप में पारित किया गया।
मेरे मन में राउ साहिब के लिये आदर है_ उन्होंने बहुत काम किया हैµउन्होंने विधान बनाने में भी बहुत मदद की है। लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि इस रिपोर्ट में उन्होंने यह बतलाया है कि उसमें थोड़े से ही व्यक्ति हैं जिनसे राय ली गई है, पर उन्होंने यह भी कबूल किया है कि इसमें समाज विभाजित है। रेणुका बहन तो अभी यहां है नहीं, लेकिन उनके बारे में भी कोई दूसरी बात मैं नहीं कह रहा हूँ। जब वे 1943-44 के विवाह-बिल पर वह बोल रही थीं, तब उन्होंने यह कहा था कि अगर जनमत लिया जाये, तो जो जोशीले जवान हैं, ‘जोशीले जवान’ शब्द उन्होंने नहीं प्रयोग किया, उन्होंने ‘यूथ’ कहा, यह ‘जोशीले जवान’ शब्द मैं कहा रहा हूँ, उसकी व्याख्या कर रहा हूँ, कि सभी जोशील जवान उनके साथ होंगे, यानी इस विधेयक के पक्ष में होंगे। मैं अपनी इस बहन से कहना चाहता हूँ कि आज इस सदन में जो छः या आठ बहने हैं, यदि वे और उनके बारे में कहा कि हिंदुस्तान में ऐसा सुसंस्कृत आदमी मिलने वाला नहीं है, जो परंपरावादी भी थे और उसके साथ समाज सुधार के काम में और अधिकारों के बारे में भी आगे आने वाले थे। इस क्षेत्र में उनसे ज्यादा काम करने वाला कौन था? लेकिन उन्हीं पूज्य मालवीय जी ने कहा था कि मैं यह ठीक नहीं मानता हूँ कि इस रीति से हिंदू संहिता विधेयक बनाया जाये। अच्छा, उनकी बात छोड़ दीजिये। आप सर तेज बहादुर सप्रू को तो जानते ही होंगे, वह भी अक्ल और होशियारी में किसी से कम नहीं थे, उन्होंने भी कहा था मैं इसके हक में हूँ, लेकिन मैं मानता हूँ, कि अभी यह अवसर नहीं है कि इस तरह का विधेयक बनाया जाये। मैं इससे आगे भी बताता हूँ। सर चिमनलाल सीतलवाड़ जिनकी हैसियत किसी से कम नहीं थी और जो समाज सुधार में सबसे आगे थे, उन्होंने कहा था कि मैं संहिताकरण नहीं मानता हूँ, मगर विधवाओं और बेटियों को हिस्सा देने के पक्ष में हूँ। यह समझना कि सिर्फ अपनी-सी बात कहने वाले समझदार हैं और विरोधी बात जो कहते हैं वे सरासर मूर्ख हैं, यह ठीक नहीं है। मैं बहनों और भाइयों को इस सदन की मार्फत और अध्यक्ष महोदय आपकी मार्फत कहना चाहता हूँ, कि इस विधेयक पर इस तरह विचार न किया जाये और मैं अपने माननीय नेता प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से जो अभी यहां विराजमान नहीं हैं। कहना चाहता हूँ, कि हिंदूसमाज रिवाज़ों को मिलाकर एक संहिता बनाना चाहते हैं, उसमें मैं भी जरूर शामिल हूँ, लेकिन क्या जनता को इस बारे में अपनी राय जाहिर करने का मौका दिया गया है? एक छोटे से पारसी समाज इसने अपने सारे अंगों को अपने साथ रखा, सबकी अलग-अलग राय जानी, अपने विधेयक को आगे बढ़ाया और तभी उनका काम चला, नहीं तो नहीं चल सकता। सन् 1921 में सिविल मैरिज एक्ट का संशोधन करने के लिये एक विधेयक पेश किया गया था। उसकी मंशा भी यह थी, जैसा कि आज है। तब हिंदू संहिता क्यों बनाते हो, भारतीय संहिता बना लीजिये। सब लोग एक ही देश-भारत में रहते हैं, उन सबके रीति-रिवाज भी एक होने चाहिये। जब उनकी भाषा एक हो गई, तो संहिता भी सारे भारत के लोगों की एक ही होनी