(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 234

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चाहिये, जिससे आपस में एकता फैलेगी और भारत एक हो जायेगा। मैं उस समय की एक बात बतलाना चाहता हूँ। ईसाइयों और मुसलमानों का तब इतना विरोध था कि डाक्टर गौड़ को ऐसा कहना पड़ाः इसने एक दबाव पैदा किया था। मुस्लिम और पारसी समुदाय की ओर से कि मुझे इसे छोड़कर नया विधेयक सन् 1923 में लाना पड़ा। और उनको करना भी पड़ा। हिंदू समाज की कोई कद्र नहीं है। जिसमें इतने लोग हैं, उसकी कोई कद्र नहीं है। यहाँ मालवीय जी की बात की कोई कद्र नहीं, तब पट्ाभि साहेब को तो जाने दीजिये, सर अल्लादी और लक्ष्मीकांत मैत्रेय को भी जाने दीजिये, क्योंकि उनके कहने का कोई महत्व नहीं और उनके बारे में क्या कहा जाये यानी राजेन्द्रबाबू, जिनको अजातशत्रु कहा जाता है। वह तो बुद्धि और दिमाग के भण्डार हैं और देश के हीरा हैं। जिसने गांधी जी के विचारों का पालन किया है, और जो आज देश को तो क्या, दुनिया तक को समझा सकते हैं। वह आदमी कहता है कि मेहरबानी करके, आज मौका नहीं है, इसमें कई ऐसी चीजें हैं, जो विवादस्पद हैं, उनको अलग कर दीजिये, उन पर न जाइये। लेकिन क्या करें, हमारे कुछ नेता यह कहते हैं कि नहीं, इसको जल्दी लाना चाहिये। तो जल्दी कर लें। लेकिन इतना तो ध्यान रखें कि इसमें सब लोगों की राय व मंजूरी मिल जाये। इसका एक खास फायदा डाक्टर अम्बेडकर साहब ने उठाया है। क्या उठाया, मैं बता रहा हूँ, वह क्या फायदा था। 1948 में जब यह विधेयक पेश किया गया, तब हमने आपस में बैठ कर यह तय किया कि अभी कोई साहब इस पर बोलेंगे नहीं। तब न तो अम्बेडकर साहब ने विशेष कहा न किसी और ने। उस समय यह सोचा गया था कि अभी इस विधेयक को सिर्फ पेश करने से बहनों को और दूसरों को जो सुधारक हैं, जो एकता चाहते हैं, संहिताकरण चाहते हैं, विवेकी हैं, उनको संतोष हो जाएगा। तो उन्हें संतोष होने दिया गया। इसका फायदा उठाते हुए डॉ. अम्बेडकर साहब ने कहा कि इसे लोगों ने आम तौर से मान लिया है, इसलिए यह विधेयक ठीक है। नहीं साहब, इसके अन्दर जो कई धारायें हैं, कई चीजें हैं उनको हमने नहीं देखा ही नहीं है। लेकिन क्योंकि हमारे कुछ नेताओं ने कहा कि इसको जरा आगे बढ़ने तो दीजिये। हमने कहा अच्छा! ओ ले जाइये। बाजार में लाइये। इस प्रकार यह बाजार में आया, इसका जुलुस निकाला गया है और अब हम यहां इसे देख रहे हैं। मैं तो यह कहना चाहता हूँ कि अगर इसके प्रवर समिति में जाने से पहले हमारी यह सब बहस हो जाती, तो डॉ. अम्बेडकर साहब और प्रवर समिति के हमारे मित्रों को बहुत फायदा पहुंचता। उनको यह मालूम होता कि इसकी शक्ल कैसी होनी चाहिये अब हम एक प्रकार से उलझन में पड़े गये हैं। उलझन यह आई है कि अगर हम कहते हैं कि इसे फिर से प्रवर समिति में भेजा जाय तो मालूम नहीं कायदे कानून के कैसे चंगुल में हम फंस जाएँ। अगर हम कहते हैं कि इसको अभी बन्द कर दिया जाय तो हमारे ऊपर एक तलवार खड़ी है। अब हम क्या करें? हम बहुत से पेचों में फंस गये हैं। उसमें से हमें निकालना, हमारे नेताओं का और भगवान का काम है।

मैं यह कहा रहा था कि इस विधेयक को आज इस मौके पर लाने की इसलिये जरूरत नहीं है कि हमने हिंदू समाज की राय नहीं जानी है। हिंदू समाज और वह भी