(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 235

220 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

शहरों का, जिसकी राय ली गई है, उसमें कितने लोग थे? इसमें केवल 121 व्यक्तियों ने तथा 102 संस्थाओं ने लिखित ब्यान दिये और उन्हीं की गवाही हुई है। अब क्या यह कहें कि यह हिंदू समाज की राय है? महाशय मित्तर ने जो राय दी है और वह भी प्रत्येक भाग की अलग-अलग हिस्सों में, मद्रास को छोड़ कर, सब जगह इसका विरोध किया गया है। जो दायभाग वाले हैं, उन्होंने बंगाल से विरोध किया। बम्बई वालों का विरोध आया है। क्योंकि विरोध स्वभावी है और कई कारण भी हैं, इसलिये इसका विरोध हुआ है। इस विरोध के होते हुये भी हम यह कहें कि नहीं अल्पमत वाले जो कहते हैं, वही सही बात है और वह आपको मानना पड़ेगी, तो यह बहुत मुश्किल चीज है। हिंदू समाज का जो एकीकरण किया जाये, वह कायदे से होना चाहिये। मैं यह कैसे कर सकता हूँ कि स्त्रियों को, बहनों को कोई हिस्सा नहीं देना चाहिये। उन्हें दिया जाये, लेकिन बहनों से खुद पूछ लीजिये कि हिस्सा मिल जाने के बाद क्या आपको पीहर से कोई प्यार रहेगा, कितनी मुहब्बत बाकी रहेगी? यह पूछिये तो सही सूधारों का पक्ष लेने वाली हमारी बहने हैं, उनसे कि उनका पिता कहां रहता है, भाई कहां रहता है? वे सब अपनी-अपनी काटेज में, अपने-अपने घर में, महल में बैठे रहते हैं और संबंधी के तौर पूछते भी नहीं। ऐसे आज के सुधरे हुये आदमी हैं, इसलिए अगर हिस्सा हो गया तो बाद में हम क्या करेंगे? लेकिन मैं बताना चाहता था कि इन सबके होते हुए भी अल्पमत की बातें हमारे सामने आती हैं, यद्यपि सबकी राय नहीं ली गई है, तब भी हमारे ऊपर इसका दबाव डाला जा रहा है। दबाव डाल कर कहा जा रहा है कि इस चीज को अपना लो। वे नहीं देखते कि बाद में इससे कितनी उलझनें पैदा हो जायेंगी।

मैं कहना यह चाहता हूँ कि मेहरबानी करके आप इसमें कोई बीच का रास्ता निकालिये। बीच का रास्ता निकालने से ही हमें सन्तोष होगा, समाज को सन्तोष होगा और जो हलचल है वह बैठ जायेगी। आज जैसा हमारे पाटस्कर ने कहा है, इस वक्त कई उलझने हैं। इस संधी में एक और बड़ी उलझन क्यों पैदा करते हो? एक और दूसरी कांटे की बाड़ी क्यों बोते हो जिससे रास्ता खराब हो जाए और उसे साफ करने के लिये हमें और खास मेहनत करनी पड़े। ऐसा क्यों करते हो? मेहरबानी करके कुछ दूसरा काम कीजिये और इसको एक-दो साल के लिये स्थगित रखिये। मैं अपनी बहनों से कहना चाहता हूँ, जो बहनें इसका आदर करती हैं, अपनी उन बहनों से जो देवियां हैं कि देश की भलाई के लिये आपको भी कहना चाहिये, हमारे जवाहरलाल जी से जाकर कहना चाहिये, कि मेहरबानी करके इस चीज को एक साल या दो साल के लिये रोक दीजिये। इस तरह से इसके अन्दर बहुत-सी चीजें समाविष्ट हो जायेंगी। लेकिन वे तो यह सोचती हैं कि आज सन् 1950 की अवधि में यदि यह संहिता पारित नहीं हुई तो कभी नहीं होगी, क्योंकि आगे जो लोग आयेंगे वे विधेयक पारित नहीं होने देंगे। लेकिन मैं चाहता हूँ कि अगर आज अपनी संहिता आपने पारित भी कर दी तो आइन्दा क्या होगा? यहां बैठने वाले लोग ऐसे आयेंगे जो यह कहेंगे कि पहला काम हमारा यह होगा कि यह जो