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हिंदू संहिता बनती है उसमें सुधार कर दें। इसलिये मैं अर्ज करना चाहता हूँ कि मेहरबानी करके अगर इस चीज को रोक सकते हैं तो जरूर रोकिये। और अगर नहीं रोक सकते हैं तब मेरी सलाह है जिस वायीं ओर जायें न दायीं ओर जायें, बीच का रास्ता अपनाईये। स्वर्ग अवसर तलाश करें, इससे ही समाज को संतोष जो सकता है।
दूसरी बात यह कि डॉ. अम्बेडकर साहब ने मिस्टर सर्वटे के ‘प्वाइंट आफ आर्डर’ का जवाब देते हुये कहा था और उपाध्यक्ष महोदय, आपने भी उसका समर्थन किया था कि विधेयक सिर्फ प्रांतों में जो कि आज हमारे प्रांत हैं उन्हीं पर ही लागू होने वाला है। और अगर उसे रिसायतों पर लागू करेंगे तो वह रियासतों के पास विधेयक भेजा जाएगा, वहाँ इस विधेयक को परिचालित किया जायेगा और उसके बाद हम देखेंगे कि इसमें क्या हो सकता है। डॉ. अम्बेडकर साबह ने तब यह कहा थाःµ
फ्जब इस विधेयक की सीमा को भारतीय रियासतों तब बढ़ाने का अवसर आएगा और उस उद्देश्य का उचित प्रस्ताव इस सभा के समक्ष रखा जाएगा, तो उस दिन सरकार उनकी इच्छाओं तथा उद्देश्यों पर ध्यान देगी और इसमें कोई संदेह नहीं कि तब हम सभी भारतीय संघ में शामिल होने वाली रियासतों से भी सलाह करेंगे।य्
यदि यही स्थिति है, तो जिसे आज पारित किया गया है, छः महीनों के बाद फिर रियासतों के पास भेजा जाएगा और रियासत वाले चाहेंगे तो आप और आगे चले जायेंगे। रियासत वाले तो वैसे ही कुछ पीछे हैं, वह इससे और भी पीछे हो जाएंगे। तो मेहरबानी करके आप इस चीज को भी अपनी निगाह में रखिये कि क्या हो सकता है।
मुझे यह कहने की अनुमति दीजिये कि इसमें लोकमत जानने का तरीका सही नहीं था। यह मैंने पहले बता दिया है। लेकिन हमारा विधान जो हमने ढाई-तीन साल में बनाया, उसमें हमने कितनी सावधानी बरती थी, तो भी हमारे बहुत सारे भाई कहते हैं कि वह ठीक नहीं बना। हमने प्रांतों की सरकारों को पूछा, उनके पास विधान का मसौदा भेजा, और वहां विधान सभाओं में, मंत्रिमंडल में उस पर चर्चा हुई और उन्होंने अपनी राय भेजी। पर यह भी आप जानते हैं कि राउ कमेटी ने अपनी रिपोर्ट का मसौदा किसी प्रान्तीय सरकार के पास राय के लिये भेजा ही नहीं, इस तरीके से यह संहिता प्रस्तुत है। इसीलिये मैं कहना चाहता हूँ कि लोगों की राय पूरी और सही तौर से नहीं ली गई है। जिस आधार पर आपका यह दावा है वह भी ठोस नहीं है। इसमें मुझे कोई शक नहीं कि रेणुका बहन ने कहा था कि आधा देश इसके साथ है। लेकिन राउ कमेटी की रिपोर्ट ने कहा है कि समाज इस पर विभाजित है। यह देखते हुए मैं किसकी बात मानूं। जिन्होंने जांच करके 1947 में रिपोर्ट दी है उनकी मानूं या रेणुका बहन की 1944 की बात मानूं?
माननीय उपाध्यक्षः अभी कई सदस्य बोलने वाले हैं, मेहरबानी करके खत्म कीजये।