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तो मैं यह कहना चाहता हूँ कि बहनों को यह दुगने अधिकार क्यों देने चाहिए। वह अपने पीहर से स्त्रीधन ले जायगी, दहेज में और दूसरी चीजें जो पिता देगा वह ले जायेगी और फिर अपना हिस्सा भी ले जायेगी और पति के घर में तो उसका हिस्सा है ही। तो यह बहनें इतनी स्वार्थी कैसे बन गईं? महिलाएं स्वतः समृद्धि की अवतार हैं। वे संसारिक माया और अधिक क्यों चाहती है? श्रीमती कमला चौधरी ने कहा है कि निःसंदेह धन और समृद्धि स्वभावतः धनी और समृद्धि की ओर वापिस जाएगी। महिलाएं स्वतः धन और समृद्धि की अवतार हैं। वे इस में और वृद्धि क्यों करना चाहती है? जो थोड़ा-सा मोह और माया अब तक इनके पास है, उससे तो यह संसार को वशीभूत कर सकी हैं। अब और ज्यादा मोह और माया बढ़ जायेगी तो कोई नहीं कह सकता कि क्या हो जाएगा? अगर माया निःसंदेह माया के पास जायेगी, तो प्रकृति और प्रकृति रहेगी। संसार में और पुरुषों को निकाल दीजिये। अगर पुरुष के बिना माया की चलना हो तो ऐसा ही कीजिये।
हमारे ट्रावनकोर और कोचीन के मित्र बहुत आगे हैं लेकिन उनको भी ध्यान रखना चाहिये कि उनके अकेले आगे-जाने से काम नहीं चलेगा। उन्हें गांव वालों को भी अपने साथ रखना चाहिये और अगर उनको भी साथ लेना है तो मेहरबानी करके और ज्यादा प्रचार कीजिये और उनको इसके निहितार्थ समझाइये, तो इसी तरह इसका उद्देश्य पूरा हो जाएगा, इसमें सन्देह नहीं है। कई जगह यह कहा जा रहा है कि यह उलटी गंगा बहाई जा रही है और यह कुछ अंश में ठीक भी है। पानी को ढाल में स्वाभाविक रूप में बहने दीजिये और अगर आप अल्पमत के मुद्दों को उठा कर उल्टी गंगा बहायेंगे तो अभी आप ऐसा कर सकते हैं। लेकिन आइन्दा इस किस्म का जमाना आयेगा कि इसमें ऐसे किए गए उग्र संशोधन आपको अचम्भित, अवाक कर देंगे। जो होना है उसे होना देना चाहिए। मैं इसके विस्तार में नहीं पड़ना चाहता।
मैं एक बात और कहना चाहता हूँ कि हमारे स्मृतिकार (कानूनदान) याज्ञवल्क्य, मनुस्मृति से भी जरा आगे गये हैं। मैं इस झगड़े में नहीं पड़ना चाहता कि यह मनुस्मृति कौन से मनु की बनाई हुई हैं क्योंकि मनु बहुत से हुये हैं। परन्तु याज्ञवल्क्य स्मृति के भाष्यकार श्री विज्ञानेश्वर ने, जो मिताक्षर ने भाष्य लिखा है और वे जो दायभाग और मयूख-भाष्य के लिखने वाले हैं, उन्होंने अलग और विशिष्ट राय रखी है। मैं सारे उदाहरण तो नहीं देना चाहता। पर उन्होंने कहा है कि यदि स्त्री को स्त्रीधन न दिया गया हो तो जितना अंश पुत्र को मिले उतना ही स्त्री को भी मिलना चाहिये। यह स्पष्ट रूप से कहा गया है। मैं दावे के साथ कहना चाहता हूँ कि स्त्रीधन का जिक्र हमारी स्मृतियों में है। इंग्लैण्ड के लोगों ने अपनी तक अपने कानून को संहिताबद्ध नहीं किया। मैं यह बताना चाहता हूँ कि अंग्रेजी की ‘बुक आफ प्रेयर्स’ में शादी के लिये जो निषिद्ध कोटियाँ दी गई हैं, वह 1565 ईस्वीं में तय की गई थीं। वह 1915 ईस्वी तक उसी तरह प्रभावशील