224 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
रही फिर सन् 1915 में सिर्फ एक कोटि में परिवर्तन किया है कि साली से शादी नहीं हो सकती थी। तो मैं कहना चाहता हूँ कि हम इससे तो बहुत आगे गये हैं। उनको एक कोटि बदलने में कितने वर्ष लगे और यहां, सिविल विवाह कानून में दूसरे क्रम की भतीजी को भी विवाह करने की अनुमति दे दी है। जो बहुत चाहते हैं, वे सिविल विवाह कानून को माध्यम बना लें, लेकिन वही शर्त सब पर क्यों लगाते हैं? सिविल विवाह कानून में दूसरे क्रम की भतीजी का प्रावधान सेकिंड है। जो उसके अनुसार चलना चाहे चलें। इस संहिता को बनाने में हमको सुजनन विज्ञान के सिद्धांतों का भी ध्यान रखना चाहिये। ऐसी बात नहीं है कि स्मृतिकारों ने जो मन में आया वहीं लिख दिया। हमारे स्मृतिकार सुजनन विज्ञान के ज्ञाता थे। वे मामूली आदमी नहीं थे। वह काफी बड़े जानकार थे। जो कुछ वे सिद्धांतों का प्रतिपादन करते थे, वे सभी तरह से पूर्ण और परिपक्वता के साथ प्रस्तुत किए जाते थे। उनकी कोटियां इतनी पूर्ण होती थीं कि उनमें 6, 8, 10 या 12 महीनों के बाद ही परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं होती थी। हमारे स्मृतिकार बड़े बुद्धिमान थे। जो कुछ उन्होंने लिखा है उसमें संशोधन करने के लिये सैकड़ों साल तक विचार करने की आवश्यकता है। बेशक, आप उसमें संशोधन अवश्य कीजिये क्योंकि कालांतंर में स्मृतियों में संशोधन होते रहे हैं। लेकिन हमको यह पूरी तरह विचार कर लेना चाहिये कि ऐसा करने से समाज का फायदा है या नुकसान है।
श्री एच.वी. कामत (मध्यप्रांत और बरारः सामान्य)ः क्या सदन सम्मानीय के सदस्य बुद्धिमान नहीं हैं?
माननीय उपाध्यक्षः आप आगे बोलिए।
श्री गोकुलभाई दौलतराम भट्टः मैं इतना बुद्धिमान और पंडित नहीं हूँ जितने श्री कामत हैं। मैं यह नहीं कहता कि यहां के सदस्यों में बुद्धि नहीं है। हर एक आदमी में अपनी बुद्धि होती है, हर एक आदमी सोच भी सकता है। लेकिन मैं यह कहता हूँ कि मैं डाक्टर अम्बेडकर की हर बात नहीं मानूंगा कि महान लोगों के महान विचार होते हैं। इसी तरह अगर कोई पंडित (विज्ञान) आकर कहे कि जो अस्पृश्यों के साथ किया गया है, वह ठीक नहीं है, तो मैं उसको भी नहीं मानूँगा, क्योंकि मैं महान लोगों के महान विचार होते हैं, का मानने वाला नहीं हूँ। लेकिन मैं अजऱ् यह कर रहा था कि जो स्मृतिकारों ने किया है वह समाज के भविष्य को अपने सामने रख कर किया है। यह ठीक है कि उस समय का समाज किस तरह का था उसी के अनुसार स्मृतियां बनीं। आज हमारे समाज में अनेक जातियां हैं और उप-जातियां हैं। अलग-अलग समुदाय हैं, अलग-अलग सिद्धांतों को मानने वाले हैं। सिख हैं, जैन हैं, बौद्ध हैं और अनेक मतों को मानने वाले हैं। वह धार्मिक-समुदायों में बंटे हुये हैं। उन सबको सम्मिलित करना कोई मामूली चीज नहीं है।