(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 240

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महोदय, मैं अब थोड़ा ही समय और लूंगा। मैं अजऱ् कर रहा था कि डॉ. अम्बेडकर साहब ने कहा हैः फ्रीति-रिवाज संहिता को नष्ट कर देंगे, इसलिए उन्हें शामिल न किया जाए।य्

दूसरी तरफ वे कहते हैं कि कानून जो राजाओं और जागीरदारों के उत्तराधिकार को अधिशासित करते हैं जिन्हें नहीं होना चाहिए, होनी चाहिए। और जब रीति-रिवाजों के अधिकारों का प्रश्न आता है_ वे कहते हैं कि वह नहीं होना चाहिए।

एक ओर उत्तराधिकार की बात आती है और दूसरी ओर दत्तकग्रहण वे कहते हैं कि ये रूढि़गत रिवाज जारी नहीं रहने चाहिये। यह दोनों बातें नहीं चलनी चाहिए। आप दोनों को खत्म कर दीजिये, एक-सा मैदान कर दीजिये, अथवा एकदम सफाचट कर दीजिये। महोदय, मैं फिर आपसे कहता हूँ कि यहाँ कई जगहों पर छोटी-मोटी टोका-टाकी भी हो रही है, जिसकी वजह से मुझे बोलने में दिक्कत हो रही है।

एक माननीय सदस्यः वह एक जैसे तर्क दोहरा रहे हैं।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (कानून मंत्री)ः महानुभाव को बोलते एक घंटा हो गया है।

माननीय उपाध्यक्षः शांति, शांति। उन्हें ज्यादा देर न बोलने के लिए कहने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप शोर न मचायें, बल्कि उन्हें अकेला छोड़ दें ताकि मैं उन्हें अपना भाषण जल्दी पूरा करने के लिए कह सकूं। आदरणीय सदस्य जानते हैं कि कई अन्य सदस्य बोलने को उत्सुक हैं। वह पहले ही 45 मिनट से अधिक समय ले चुके हैं।

श्री गोकुलभाई दौलतराम भट्टः मैं आपका आभारी हूँ। तो मैं आपसे यह अजऱ् कर रहा था कि एक जगह आप कहते हैं कि परंपरा से कोई दिक्कत नहीं है, यह रीति-रिवाज चलने चाहिये। दूसरी ओर अगर यह जारी रहे तो इससे हिंदू संहिता की हत्या हो जायेगी। यह दोनों बातें मैं नहीं चाहता। आप हम से कहते हैं कि ज्यादा अनाज उगाओ। हमारे पास जितनी भी जमीन है, चाहे उसमें बाग लगे क्यों न हों, चाहे अच्छे-अच्छे लॉन क्यों न हों, अगर हमको अनाज उगाना ही है तो हमको इन सब जमीनों पर भी अनाज उगाना चाहिये। एक तरफ तो आप यह चाहते हैं कि आपके लॉन यथावत रहें और दूसरी तरफ आप चाहते हैं कि अनाज भी ज्यादा उगाया जाये। ऐसा रास्ता मुझे पसन्द नहीं है।

आप जानते हैं कि परंपरा क्या है? हमें कूल की परम्परा, ग्राम की परंपरा और राष्ट्र की परंपरा को समझना चाहिये। शास्त्र के अनुसार परंपरा प्रबल है। शास्त्र के माने क्या हैं? शास्त्र का बार-बार हवाला देने से आप लोग समझते होंगे कि मैं पागलपन की बात कर रहा हूँ। शास्त्र एक विज्ञान है। एक प्रबन्ध है, एक कानून है। वह एक स्मृति है।