(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 243

228 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

विधेयक का विरोध करने वालों को जो मैं पहला सुझाव देना चाहता हूँ वह यह है। उनका कहना है कि यह सभा हिंदू विधि के प्रावधानों को छूने के लिए सक्षम नहीं हैं क्योंकि यह समय पर खरे उतरे धर्म का मामला है जो शताब्दियों से गुजर कर हमारे पास आया है और इसमें ‘पंडित परिषद’ ही कोई परिवर्तन कर सकती है। मैं बड़ी विनम्रता से अनुरोध करता हूँ कि यह स्थिति एक मिनट के लिए भी स्वीकार नहीं की जा सकती। जैसा कि श्री अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर तथा अन्य ने कहा है, हिंदू विधि कभी गतिहीन नहीं रही। इसमें समय-समय पर परिवर्तन होता रहा है। हर बार जन समाज के ढांचे में परिवर्तन आया तो एक स्मृतिकार, एक मनीषी, एक ऋषि, एक मुनि पैदा हुआ और उसने ऐसे सुधार किये जो समय के अनुकूल थे। यह प्रक्रिया शताब्दियों तक चलती रही जब तक कि देश अंग्रेज शासन के अधीन नहीं आया। इस अवधि के दौरान कानून में केवल ऐसे परिवर्तन किये जा सके जो या तो न्यायाधीशों ने किये जिनका काम कानून की व्याख्या करना था या विधानमंडल ने किये। मनु या याज्ञवल्क्य या विश्वमित्र जैसे किसी नये मनीषी ने अवतार नहीं लिया। न्यायाधीश, जिसका काम स्मृतियों या पुस्तकों में उपलब्ध विधि की व्याख्या करना था, इसकी व्याख्या कर सकते थे या विधानमंडल हस्तक्षेप कर सकते थे, अतः वर्ष 1949 में यह तर्क देना व्यर्थ है कि विधानमंडल सक्षम नहीं है, क्योंकि इस में हर तरह के ऐसे लोग हैं जिनको स्मृतियों का ज्ञान नहीं है। मैं समझता हूँ, यह तर्क एकदम ठुकरा दिया जाना चाहिये। यदि आप उस घटनाक्रम को देखें जिसका इस देश के विधानमंडलों ने एक शताब्दी से अधिक के लिए अनुसरण किया है तो आपको पता चलेगा कि जब कभी यह देखा गया है कि हिंदू विधि या इसकी कोई शाखा दोषपूर्ण है तो विधान पेश किया गया। यह काम स्वर्गीय राम मोहन राय के मार्गदर्शन में 1829 में सती प्रथा निवारण अधिनियम से आरम्भ हुआ। सती प्रथा को, जो हिंदू धर्म का एक अंग समझी जाती थी, किन्तु जो वास्तव में इसका अंग नहीं थी और जो, मैं कहूंगा, धर्म के सिद्धांतों का दुरुपयोग थी, खत्म किया जाना था और इस प्रयोजनार्थ 1829 में विधान प्रस्तुत कया गया।

माननीय उपाध्यक्षः कानाफूसी बहुत हो रही है। रिपोर्टर नोट करने में असमर्थ है। मैं भी सुन नहीं पा रहा।

सार्जेन्ट रोहिणी कुमार चौधरीः अध्यक्ष की आवाज भी अस्पष्ट है। उनके पास दो माईक हैं जो एक दूसरे से काफी करीब है। हम भी उनको ठीक तरह नहीं सुन पा रहे।

माननीय उपाध्यक्षः वह फोन के आगे बोल रहे हैं। हर स्थान को एक छोटे फोन में बदल दिया गया है। मैं क्या करूं?

अतः माननीय सदस्य मध्याह्न भोजन के पश्चात् अपना भाषण जारी रखेंगे। सभा 2.30 अपराह्न तक के लिए स्थगित की जाती है।