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श्री ए. थानू पिल्लेय (ट्रावनकोर और कोचीन संयुक्त प्रांत)ः क्या मैं एक सुझाव दे सकता हूँ? (व्यवधान) मेरा प्रश्न यह है।
कुछ माननीय सदस्यः सभी स्थगित कर दी गई है।
माननीय उपाध्यक्षः आपने विलम्ब कर दिया है, अब सभा स्थगित हो चुकी है।
श्री ए. थानू पिल्लेयः मुझे खेद है। मुझे मालूम नहीं था।
तत्पश्चात् सभा मध्याह्न भोजन के लिए 2.30 बजे तक के लिए स्थगित हुई।
सभा मध्याह्न भोजन के पश्चात् 2.30 बजे पुनः एकत्र हुई।
(माननीय उपाध्यक्ष (श्री एम. अनंथसयनम आयंगर) पीठासीन हुए)
डॉ. बख्शी टेक चन्दः महोदय, जब सभा उठी थी, तो मैं सती के उन्मूलन के लिए श्री राम मोहन राय के मार्गदर्शन में 1829 में पारित अधिनियम का उल्लेख कर रहा था। अब जैसा कि हम सभी जानते हैं उस समय यह तर्क दिया गया कि सती हिंदू धर्म का एक अंग है। यह कहा गया कि सती हमारे धर्म का एक आवश्यक अंग है और इसमें कोई हस्तक्षेप हिंदू धर्म पर प्रहार समझा जायेगा। किन्तु समुदाय के विवेक की जीत हुई। कानून बना और सती प्रथा बन्द हो गई। यह प्रथा, जैसा कि मैं कह रहा था, हिंदू विधि का अंग नहीं थी। यह एक नया परिवर्तन था जो अंधकार युग या मध्यकालीन युग के दौरान शुरू हुआ। सौभाग्य से उसे विधानमंडल द्वारा कानून बना कर समाप्त कर दिया गया।
उसके बाद, जहां तक विरासत के अधिकार का सम्बन्ध है, वर्ग निर्योग्यताओं को हटाने के लिए 1850 का कानून बना। यदि कोई व्यक्ति या वारिस अपना धर्म बदलता था, तो उत्तराधिकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। यह दूसरा बड़ा परिवर्तन था, जो हिंदू विधि में किया गया। उसके बाद एक बहुत बड़ा सुधार 1856 में आया जब विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित हुआ। शताब्दियों तक यह विश्वास किया जाता रहा कि हिंदू धर्म विधवाओं के पुनः विवाह की इजाज़त नहीं देता।
श्री महावीर त्यागीः महोदय, क्या मैं जान सकता हूँ कि क्या यहां सरकार का कोई प्रतिनिधि है।
माननीय श्री के.सी. नियोगी (वाणिज्य मंत्री)ः सरकार एकीकृत एवं अविभाज्य है और जब तक एक भी मंत्री उपस्थित है, मैं समझता हूँ वह पूरी सरकार का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम हैं।
माननीय उपाध्यक्षः मैं समझता हूँ दूसरे पक्ष के सदस्यों को सदैव इस पक्ष में आकर बैठने की आकांक्षा रहती है।