230 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
डॉ. बख्शी टेकचन्दः जैसा कि मैं कह रहा था, विधवा पुनर्विवाह को हिंदू धर्म का एक आवश्यक अंग समझा जाता था और उस कानून को रद्द करने के किसी सुझाव अथवा विधवा पुनर्विवाह की अनुमति देने वाला कोई कानून बनाने के प्रस्ताव पर जोरदार विरोध किया जाता था। किन्तु श्री ईश्वरचन्द्र विद्यासागर तथा उस समय के अन्य नेताओं के नेतृत्व में जनमत उमड़ा और यह बड़ी निर्योग्यता, जिससे हिंदू महिला पीडि़त थी, एक और विधान बनाकर हटा दी गई। और यह विधान बनाने से हिंदू धर्म समाप्त नहीं हुआ।
उसके बाद कई अधिनियम बनाकर हिंदू विधि में संसद या तत्कालीन विधानमंडल द्वारा संशोधन किये गये। आपमें से अधिकांश को 1890 और 1891 का महान आन्दोलन याद होगा जब सहमति की आयु विधेयक पेश किया गया। उस समय यह आवाज उठाई गई थी कि हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों से बने विधानमंडल ने, जिसमें नौकरशाहों का प्रभुत्व है, उस प्रथा के बारे में कानून बनाया, जो बारह वर्ष से कम आयु की बालिका बधू से भी समागत की अनुमति देती थी तो यह हिंदू धर्म में घोर हस्तक्षेप था। उस समय समाचार-पत्रों में, अमृत बाजार पत्रिका जैसे अच्छे समाचार-पत्रों में भी जो कुछ प्रकाशित हुआ, आपके पास यदि उसका संग्रह है तो आप देखेंगे कि उस समय हिंदू समाज किस प्रकार की खलबली में था। किन्तु पुनः विधायिका सफल हुई और वह विधेयक पारित हुआ, जो अन्ततः पिछले सत्र में सभा की लगभग सर्वसम्मति से संशोधनकारी विधेयक के रूप में पारित हुआ और जिसे हमारे मित्र पंडित ठाकुर दास भार्गव ने पेश किया और जो यदि मुझे ठीक याद है तो सभी पक्षों द्वारा सर्वसम्पति से पारित किया गया। उस समय हमारे किसी मित्र ने यह नहीं सोचा कि यह सभा ऐसे विषय के बारे में विधान बनाने में सक्षम नहीं है जो हिंदू धर्म का अनिवार्य अंग माना जाता था। जहां तक अभी हाल की बात है, आप देखेंगे कि 1916 में भारतीय विधानमंडल ने सम्पत्ति प्रबन्ध अधिनियम नामक अधिनियम पारित किया है। यह एक ऐसा अधिनियम है जिसके अन्तर्गत टैगोर बनाम टैगोर नामक मामले में प्रिवी परिषद द्वारा बनाये गये कानून को रद्द किया गया। उस मामले में स्मृतियों के कुछ पाठों के अनुसरण में प्रिवी परिषद ने निर्णय दिया था कि एक वर्ग के व्यक्तियों के पक्ष में जो उपहार की तिथि तक पैदा नहीं हुए हैं, दिये गये आदेश या उपहार हिंदू विधि के अनुसार अमान्य या शून्य हैं। करीब साठ या सत्तरह वर्षों तक यह कानून बना रहा। तब यह सुझाव दिया गया कि पाठों की यह व्याख्या गलत है। इस मामले पर विचार किया गया और यह पाया गया कि कुछ पाठों से उनके शाब्दिक अर्थों के अनुसार केवल वही निष्कर्ष निकाला जा सकता है जो प्रिवी परिषद ने निकाला। इसे एक बड़ी बाधा और एक बड़ा अन्याय पाया गया। अतः विधानमंडल ने पुनः हस्तक्षेप किया और सर्वसम्पत्ति से संसद ने 1916 में वह विधेयक पारित किया।