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उसके बाद निर्योग्यता निवारण विधेयक आया। कुछ स्मृतियों द्वारा प्रतिपादित हिंदू विधि के कुछ पाठों के अन्तर्गत यदि किसी व्यक्ति में शारीरिक निर्योग्यता है, यदि वह अंधा है, यदि वह बहरा और गूंगा है तो वह उत्तराधिकार का अधिकारी नहीं है। अनेक लोगों ने सोचा कि पाठों का अर्थ जो भी हो, यह बड़ी मुसीबत है। यदि पांच बेटों में से एक बहरा या अंधा हो या किसी अन्य निर्योग्यता से पीडि़त हो तो उसके मामले में यह और भी आवश्यक हो जाता है कि उसे पिता की पैतृक सम्पत्ति में हिस्सा मिले, बजाय इसके कि शारीरिक रूप से योग्य और कमाई करने के योग्य व्यक्तियों को हिस्सा मिले। खैर, वह पाठ उस समय कुछ मान्य या उपयोगी रहा होगा। जब प्राचीन काल में समाज का ढांचा ऐसा था कि परिवार की सम्पत्ति को बढ़ाने के लिए यह आवश्यक था कि सभी काम करें। यह अप्रचलित हो गया और हिंदू समुदाय ने इसके विरुद्ध विद्रोह किया और यह विद्रोह ऐसा था कि भारतीय विधानमंडल को 1928 में यह कानून पारित करना पड़ा जिसके बाद शारीरिक दोषों से पीडि़त व्यक्तियों को भी उसी प्रकार उत्तराधिकार दिया गया जिस प्रकार शारीरिक रूप से योग्य व्यक्तियों को। हिंदू विधि में यह एक और हस्तक्षेप था।
तत्पश्चात् एक और अत्यन्त महत्वपूर्ण अधिनियम, 1929 का अधिनियम- II आया, जिसके अन्तर्गत कुछ ऐसे वर्गों के लोगों को उत्तराधिकार दिया गया जो तब तक न्यायालयों के निर्णयों के अनुसार सम्पत्ति के उत्तराधिकारी बनने के हकदार नहीं थे।
मिताक्षर मत के पाठ के अनुसार, भारत में न्यायालयों ने और अन्ततः प्रिवी परिषद ने यह निर्णय दिया था कि ऐसी केवल पांच वर्गों की ही महिलायें हैं जो उत्तराधिकारी हो सकती हैं क्योंकि इन पांच का मिताक्षर में उल्लेख है। पर बम्बई मत का यह विचार था कि यह सूची पूरी नहीं है, अपितु, निर्देर्शी मात्र है और महान टीकाकार नीलकांत तथा उसके अनुयाइयों का यह विचार था कि उत्तरी भारत में मिताक्षर की गलत व्याख्या के कारण यह प्रथा प्रचलित है। खैर, विधानसभा में वह विधेयक पेश किया गया और काफी विचार-विमर्श के बाद विधेयक पारित हुआ और वासियों की सूची में बेटी, बहन, बहन के बेटे आदि सभी को शामिल किया गया। इससे भी विशेषरूप से उत्तरी भारत, में हिंदू विधि के ढांचे में बड़ा परिवर्तन आया।
आप सभी शारदा अधिनियम के बारे में जानते हैं। मैं उसे नहीं दोहराऊंगा। उस समय इस सभा में यह तर्क दिया गया था और गम्भीर रूप से तर्क दिया गया था कि विवाह की न्यूनतम सीमा निर्धारित करना हिंदू धर्म में हस्तक्षेप है। खैर, विरोधी पक्ष सफल नहीं हुआ और विधानमंडल अड़ा रहा तथा विधेयक अन्ततः पारित भी हुआ।
उसके बाद देशमुख विधेयक नामक विधान हमारे सामने आया। सन् 1937 के उस विधेयक का बड़ा असर हुआ। इससे हिंदू उत्तराधिकार विधि में बहुत बड़ा परिवर्तन