(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 247

232 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आया। उन क्षेत्रों में, जहां मिताक्षर सिद्धांत लागू होता था, एक संयुक्त हिंदू परिवार में एक सह-हिस्सेदार की मृत्यु के पश्चात् यदि उसका कोई बेटा नहीं होता था तो विधवा को कोई हिस्सा नहीं मिलता था। वह पति के भाई या पति के पिता तथा अन्य सहभागियों पर अपने भरण-पोषण के लिए पूर्णतया उनकी दया पर निर्भर रहती थी। उसे केवल अनाज और कपड़े मिलते थे और कुछ नहीं। उस कानून में यह प्रावधान किया गया कि जिन विधवाओं के बच्चे नहीं होंगे उनको भी सम्पत्ति में वही हिस्सा मिलेगा जिसका उसका पति हकदार होता था और यदि वह चाहेगी तो वह सम्पत्ति के विभाजन के लिए भी कह सकेगी। उस समय यह निर्णय दिया गया कि एक संयुक्त परिवार में हिंदू महिला को बंटवारे के लिए मुकदमा करने का अधिकार दिया जाना हिंदू विधि के मूलभूत सिद्धांतों के प्रतिकूल है। किन्तु विधानमंडल ने पुनः यह परिवर्तन कर दिया जो बदलते हुए समय न केवल महिलाओं में अपितु, इस देश के पुरुषों में, हिंदुओं में बढ़ती हुई चेतना को देखते हुए आवश्यक था, क्योंकि वे चाहते थे कि उनकी बहनों और माताओं को भी यह अधिकार मिले। तब उस समय भी देश में काफी हलचल थी किन्तु अन्ततः वह हलचल शांत हो गई। बारह वर्ष बीत गये हैं और हम नहीं कह सकते कि हिंदू समाज किसी तरह टूटा है या हिंदू धर्म पर कोई इतना बड़ा प्रहार हुआ हो कि यह टूटने वाला है।

अब मैं अभी हाल के समय की ओर आता हूँ। 1946 ई. में, इस विधानसभा के अस्तित्व में आने से कुछ पूर्व, सगोत्रों के बीच विह की इजाजत देने वाला विधेयक इस विधानमंडल द्वारा पारित किया गया। वह विधेयक निषिद्ध हद तक हस्तक्षेप नहीं करता था। जो लोग देश के विभिन्न भागों में रहते थे और एक ही जाति के नहीं होते थे फिर भी पाठों के कुछ तकनीकी अर्थ के अनुसार एक ही गोत्र के होने के कारण उनमें विवाहों को अमान्य ठहराया जा सकता था। यद्यपि ऐसे विवाह देश के विभिन्न भागों में होते भी थे, पर उनकी वैधता संदेहास्पद थी। अतः यह भी एक समर्थकारी विधान था, जो 1946 में पारित हुआ और जिस पर कोई गम्भीर आपत्ति नहीं की गई।

अब मैं माननीय सदस्यों का ध्यान, इस सभा के पिछल अप्रैल सत्र में हमने जो कुछ किया, उसकी ओर दिलाना चाहता हूँ। मेरे प्रतिष्ठित मित्र पंडित ठाकुर दास भार्गव केवल एक धारा वाला एक विधेयक लाये जो सरल था किन्तु काफी महत्वपूर्ण और दूरदृष्टि था। इस विधेयक द्वारा यह कानून बनाया गया कि हिंदू विधि के किसी पाठ या किसी प्रथा या किसी व्यवहार के प्रतिकूल विधि की मान्यता रखने के बावजूद भी हिंदुओं की विभिन्न जातियों के बीच विवाद विधिमान्य समझा जायेगा। यह एक बड़ा कदम था, एक ऐसा कदम जिससे अन्तर्जातीय विवाह संभव हो गये और ऐसे प्रतिबंध हट गये कि एक व्यक्ति को अपनी उप-जाति या अपनी जाति में ही विवाह करना चाहिये। यह कानून इस सभा द्वारा सर्वसम्मति से पारित किया गया और जहां तक मुझे याद है, विचारण के