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चरण में केवल एक व्यक्ति डॉ. अम्बेडकर ने इसके विरुद्ध आवाज उठाई थी। सभी अन्य सदस्यों ने, रूढि़वादी अथवा गैर-रूढि़वादी, दायभाग, मिताक्षर को मानने वाले या मायूख को मानने वाले या आदिवासी जाति की प्रथाओं में विश्वास रखने वाले तथा अन्य सभी लोगों ने इस विधेयक का समर्थन किया। डॉ. अम्बेडकरः निःसंदेह उन्होंने एक संकीर्ण आधार पर इसे स्वीकार किया। वह पूर्णतया विधेयक के सिद्धांत के पक्ष में थे किन्तु उनका विचार था कि चूँकि यह िंहदू संहिता, जो काफी व्यापक उपाय है, विधानसभा के समक्ष है, इसलिए हमें एक व्यापक उपाय करना चाहिये। उनकी यही आपत्ति थी जो कि तकनीकी किस्म की है। अन्यथा सभी ने सर्वसम्मति से इस विधेयक का समर्थन किया और यह अप्रैल के अन्त में किसी समय आया। अब मैं उन रूढि़वादी मित्रों से पूछता हूँ जो कहते हैं कि हिंदू धर्म खतरे में है, उसका क्या हुआ है। जिस समय संविधान विचाराधीन था उस समय हमारा कहना था कि हम एक वर्गविहीन ओर जाति-विहीन समाज की रचना करना चाहते हैं। यह हिंदू विधि के कुछ पाठों के प्रतिकूल है जो शताब्दियों से देश के विभिन्न भागों में लागू रहे हैं किन्तु फिर भी विधेयक पारित हुआ और यही भाव देश के कानून का एक अंग है। उस समय, मैं कहना चाहूंगा कि किसी ने यह नहीं कहा कि यह सभा इस पर विचार नहीं कर सकती, क्योंकि इसका निर्वाचन संविधान बनाने के प्रयोजनार्थ या दैनंदिन प्रशासन चलाने के प्रयोजनार्थ किया गया है। विवाहों के मामले में जातिप्रथा का उन्मूलन निश्चित रूप से देश के दैनंदिन प्रशासन का अंग नहीं था। यह हिंदू विवाह विधि में एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण परिवर्तन था, जो कश्मीर से कन्याकुमारी और बंगाल से गुजरात तक सभी मतों में किसी न किसी रूप में विद्यमान है। किन्तु हम सभी ने ऐसा सोच-विचार कर किया। जब विधेयक पारित हुआ तो श्री मुंशी जी यहां थे। उन्होंने कहा कि यद्यपि यह छोटा सा विधेयक है, इसके प्रभाव दूरगामी होंगे_ यह एक बहुत बड़ा परिवर्तन और काफी महत्वपूर्ण परिवर्तन है। पूरी सभा ने उस समय उनीक प्रशंसा की। मैं अपने रूढि़वादी मित्रों से, इस विधेयक का विरोध करने वालों से पूछता हूँ कि उस समय हिंदू विधि या हिंदू धर्म के लिए उनका आदर, उनका उत्साह कहां गया था? अतः मैं अपने रूढि़वादी मित्रों से बड़े सम्मान के साथ कहूँगा कि अब जो यह कहा जा रहा है कि यह विधेयक जो अब सभा के समक्ष है, हिंदू धर्म पर एक प्रहार है और इससे हिंदू धर्म की नींव डांवाडोल हो जायेगी, हिंदू समाज और हिंदू संस्कृति का पूरा ढांचा चरमरा जायेगा या यह सभा इस प्रकार का कानून केवल इसलिए नहीं बना सकती कि इसमें विद्वान पंडित अधिक नहीं हैं या इसके जो सदस्य हैं उनका निर्वाचन किसी विशिष्ट प्रयोजनार्थ नहीं हुआ था, उनके इन तर्कों में कोई दम नहीं है। मैं अपने रूढि़वादी मित्रों से सादर कहना चाहता हूँ कि वे उस विधान के इतिहास पर विचार करें, जो मैंने उनके समक्ष रखा है, हाल ही में हमने जो विधान पारित किये हैं उन पर विचार करें और इस बात पर विचार करें कि वे अन्य बातों के आधार पर विधेयक पर प्रहार कर सकते हैं, किन्तु यह कहना कि यह सभा विधान सभा होने के कारण इस पर