234 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विचार करने के लिए सक्षम नहीं या इस विधान पर विचार करने और इसे पारित करने का जनादेश देश में हमें नहीं दिया है, तो मैं बड़े आदर के साथ कहना चाहूंगा कि यह तर्क सही नहीं है। मैं उनसे अनुरोध करता हूँ कि वे विधेयक पर इसके गुण-दोषों के आधार पर विचार करें और तभी इसे स्वीकार या अस्वीकार करें। यह कहना एक चीज़ है कि विधेयक पर पर्याप्त रूप से विचार नहीं किया गया है और यह कहना दूसरी बात है कि विधेयक के कुछ प्रावधान ऐसे हैं, जिन पर आगे चर्चा और विचार करने की आवश्यकता है। इसी तरह यह कहना अलग बात है कि कुछ मामलों में विधेयक का प्रारूप पुनः तैयार करने की आवश्यकता है। जैसा कि मैंने आज सुझाव दिया है और जैसा कि श्री बी.एन. राउ ने समिति के अपने मूल प्रतिवेदन में कहा है कि संभवतया हिंदू विधि में यह सुधार अंशों में करना उचित होगा। मैं यह समझ सकता हूँ, किंतु जब हर सुबह, मुझे आशा है मुझे यह कहने के लिए क्षमा कर दिया जायेगा, हर डाक में इन महीनों में ऐसे पत्र और व्यक्तियों के भाषणों, धर्मसंघ, इस समाज और उस समाज द्वारा पारित प्रस्तावों की प्रतियां प्राप्त होती हैं और किसी न किसी महान व्यक्ति की राय देते हुए कहा जाता है कि यह सभा इस विधेयक पर विचार करने के लिए सक्षम नहीं है, तो मैं पूरे आदर और नम्रता के साथ कहूंगा कि यह न तो सही और न ही न्यायसंगत और न ही उचित है और इसलिए मैं अपने मित्रों से और इस विधेयक का विरोध करने वालों से भी यह अनुरोध करूंगा कि वे उन तर्कों पर जोर न देकर विधेयक पर उचित युक्तियुक्त और सही ढंग से विचार करें। रूढि़वादी मित्रों से मेरा यही कहना है। अब मैं अपने मित्रों से, यानी विधेयक के समर्थकों से कुछ कहूंगा।
श्री एच.वी. कामतः वे रूढि़ विरुद्ध हैं या रूढि़वादी हैं?
डॉ. बख्शी टेक चन्दः अच्छा, हर व्यक्ति को इस बारे में स्वयं निर्णय लेना चाहिये। अब स्थिति यह है कि यह विधेयक पेश हो गया है। जैसा कि हम जानते हैं, इस पर प्रथम चरण में थोड़ी चर्चा हुई जब प्रवर समिति में हम एकत्र हुए तो हमें इस महत्वपूर्ण विधेयक पर विचार करने के लिये केवल छः दिन दिये गये। और अब समिति के कुछ सदस्यों ने विधेयक के कुछ भागों पर कुछ आपत्तियां उठाईं, तो हमें बताया गया कि इस प्रस्ताव का सिद्धांत विधेयक के उन मूलभूत सिद्धांतों के प्रतिकूल है, जो प्रथम पाठन के समय सभा द्वारा स्वीकार किये गये हैं और इसलिए हम, प्रवर समिति के सदस्य, जो उन महत्वपूर्ण मामलों में संशोधन रखना चाहते हैं, अब कुछ नहीं कर सकते। हमने निर्णय माना और जुलाई की गर्मी में इस विधेयक पर चर्चा करने के लिए हमारे पास केवल छः दिन थे और इस अल्प अवधि के भीतर विद्यमान परिस्थितियों में हम जो कुछ कर सकते थे किया और उस समय माननीय विधि मंत्री द्वारा तय की गई सीमित सीमाओं में किया। न केवल विधि मंत्री अपितु प्रवर समिति के कुछ उत्साही सदस्यों ने यह सोचाः फ्खैर, अब यह विधेयक हमारे समक्ष आया है_ हम सभी इस