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सत्र में इसे पारित कर देंगे और अक्तूबर या नवम्बर का महीना आने तक यह संविधि पुस्तिका का अंग बन जायेगा? तब नई आपत्तियां उठाई गईं और कई तर्क दिये गये कि हमें कुछ महीने प्रतीक्षा करनी चाहिये। अन्ततः दो सदस्यों के बहुमत से प्रवर समिति ने इस पर आगे विचार करने का निर्णय ले लिया।य्
यह काम कुछ इस ढंग से हुआ है कि एक महीने के भीतर इस विधेयक को संविधि पुस्तिका में नहीं डाला जा सकता। परिस्थितियों के कारण, जो हमारे बस की नहीं थी, प्रवर समिति के बहुमत के बस की नहीं थी, कार्य में विलम्ब हुआ है। मुद्दा जिसे मैंने प्रवर समिति में उठाया था और जिस पर मैंने अपनी विरोध टिप्पणी में भी विस्तार से प्रकाश डाला था और जिसकी पुनरावृत्ति करने की मैं सभा से अनुमति मांगता हूँ वह यह था कि यह विधेयक अनमने ढंग से लाया गया था और यदि मुझे कहने की अनुमति हो तो मैं कहूँगा कि यह एक बहुत की खंडित विधान है। मैं इस बात का पूरा समर्थन करता हूँ और मुझे पुनः कहने में कोई संकोच नहीं है कि अब समय आ गया है जबकि हमें अपनी बहनों और अपनी बेटियों को पूरे अधिकार देने चाहिये। कहने का अर्थ यह है कि अब समय आ गया है जब हम पुराने पाठों को जारी रखने की अनुमति नहीं दे सकते, अथवा इंग्लैण्ड के न्यायालयों द्वारा दी गई उनकी इन व्याख्याओं को जारी नहीं रख सकते कि एक महिला को पूरी सम्पत्ति नहीं मिली है, कि एक महिला इस प्रकार की सम्पत्ति या उस प्रकार की सम्पत्ति का उत्तराधिकारी बनने की हकदार नहीं है। आदि, आदि ये सब अब जाना चाहिए। सर्वप्रथम मैं यह कहूंगा और मैंने सदा कहा है कि यह सब हमारी मूल हिंदू विधि के प्रतिकूल है। मेरा दावा है और मानवीय उपाध्यक्ष महोदय मुझे कुछ और मिनट का समय दें तो मैं सिद्ध कर सकता हूँ कि यह सिद्धांत कि एक महिला की सम्पत्ति सीमित है, यह ब्रिटिशकालीन भारतीय न्यायालयों की देन है। इसका मिताक्षर विधि, या मायूख या स्मृतियों में से किसी ने भी समर्थन नहीं किया है। इसे समाप्त किया जाना चाहिये। किन्तु ऐसा करने के लिए हमें क्या करना होगा? मैंने सुझाव दिया है कि विधेयक में कुछ परिवर्तन किये जायें, कि हमें इस पर एक और दृष्टिकोण से विचार करना चाहिये जिससे महिलाओं को इस विधेयक में दिये गये स्थान से भी उच्च स्थान मिलेगा। इस पर उन्होंनें कहा हैµफ्नहीं, इस विधेयक का श्री बी.एन. राउ और डॉ. अम्बेडकर ने अनुमोदन कर दिया है और अब इसमें कोई बड़ा परिवर्तन नहीं किया जा सकता।य् इस विधेयक के समर्थकों का यही रूख है। आप माफ करें तो मैं कह सकता हूँ कि प्रवर समिति में और बाद में भी, विधेयक के समर्थक विधेयक का विरोध करने वालों से कम हठधर्मी नहीं रहे। उनका कहना हैµफ्जो भी हो, विधेयक आ गया है। इसे स्वीकार करो या छोड़ो या अस्वीकार करो, यदि कर सकते हो। कुछ दिन पूर्व प्रधानमंत्री द्वारा की गई घोषणा के पश्चात् अब यह बात दोहराई जा रही है, जब कि मैं जानता हूँ सभा के अधिकांश सदस्य स्वाभाविक रूप से अपना मत देने के लिए बाध्य हैं।