10 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सकते हैं कि मैं यह चाहता हूँ कि किसी न किसी प्रकार यह विधेयक समाप्त हो जाये। मैं इस विधेयक को समाप्त नहीं करना चाहता। मैं चाहता हूँ कि यह विधेयक पारित हो जाये। मैं यह चाहता हूँ कि इस विधेयक में की गयी सभी अच्छी बातें स्वीकार की जायें। इसलिए यह आवश्यक है कि इस विधेयक को शान्त भाव से देखा जाये। यह आवश्यक नहीं है कि आक्रोश पैदा किया जाये, इसलिए मैं चाहता हूँ कि जो कुछ भी मैं निवदेन करूं आप उसे शान्त भाव से सुनने की कृपा करें। मेरा विचार है कि डॉ. अम्बेडकर भी इसे गलत न समझेंगे। मैं यह सब विनम्र भाव से निवेदन करना चाहता हूँ तथा इसे किसी विरोधी भावना से व्यक्त नहीं कर रहा, परन्तु मुझमें यह कहने का साहस होना चाहिए जो मैं कहना चाहता हूँ और मैं चाहता हूँ कि अन्य सदस्य भी उसे कम से कम ठीक ढंग से समझें, चाहे वे इसे उदारता से न स्वीकारें। मैं यह सभी बातें विनम्र भाव से प्रस्तुत कर रहा हूँ और इस बारे में यह कम महत्व नहीं रखता। अब मैं यह प्रस्तुत करना चाहता हूँ जैसे कि इस सदन का प्रत्येक माननीय सदस्य यह जानता है कि नये चुनाव होने वाले हैं। यहां उपस्थित सभी सदस्य अप्रत्यक्ष चुनाव द्वारा आये हैं। जिन सदस्यों को हमारे बाद आना है, वे प्रत्यक्ष चुनाव और वयस्क मताधिकार द्वारा आयेंगे। हमारी इस संविधान सभा द्वारा जो प्रस्ताव पारित किया गया है उसके अनुसार चुनाव 1950 में आयोजित किये जायेंगे। उसी समय मैं यह कहने के योग्य होऊँगा। श्रीमान् जैसाकि आपने भी कहा था वह एक प्रभुसत्ता सम्पन्न निकाय होगी। फिर भी मैं औचित्य के सिद्धांत के आधार पर विनम्रभाव से यह निवेदन करना चाहता हूँ कि इस विषय में निर्णय करने की बजाय यह ठीक होगा कि उन लोगों को जिनको प्रत्यक्ष चुनाव और वयस्क मताधिकार से विधानसभा में आना है, उन्हें, चूँकि इस विषय का सम्बन्ध 30 करोड़ लोगों के दैनिक जीवन से है, इस बारे में निर्णय करना चाहिए। मैं यह निवेदन करूंगा कि यही उपयुक्त मार्ग होगा। मैं औचित्य के सिद्धांत के आधार पर विनम्र भाव से कहना चाहता हूँ। कुछ लोग महसूस करते हैं कि यह सदन केवल संविधान ही बना सकती है। यह ऐसा तर्क है जिसे कल प्रस्तुत किया गया था कि जब बारह बेटों के मध्य सम्पत्ति के विभाजन से सम्पत्ति के टुकड़े नहीं होते, तो किसी बेटी को सम्पत्ति में सम्मलित किये जाने पर सम्पत्ति के टुकड़े-टुकड़े नहीं हो सकते। परन्तु मेरा कहना है कि ‘एक भूल दूसरी भूल को न्याय-संगत नहीं ठहरा सकती’।
श्री मोहन दास गौतम ने कहा है कि यह सदन संविधान बनाने के लिए भी सक्षम नहीं है। मैं उनके इस विचार से सहमत नहीं हूँ, परन्तु यदि आप सहमत हैं, तो इस प्रकार की भूल क्यों दोहरा रहे हैं? यह बिल्कुल गलत है। यदि आप इस विचार का समर्थन नहीं करते तो यह एक अलग बात है। मेरे मत के अनुसार यह संविधान निर्मित करने वाली सदन प्रभुता-सम्पन्न निकाय है। यह पूर्ण रूप से वैधानिक है और इसी प्रकार यह सदन पूर्ण रूपेण किसी भी कानून को, जिसे वह चाहती है, आज पारित करने के लिए प्राधिकृत है। फिर भी औचित्य और अनुपात की समझ हमसे यह चाहती है कि हम इस विषय में शीघ्रता न करें। हम हजारों वर्षों से इन सिद्धांतों का पालन करते आये हैं, इसीलिए मैं यह