(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 251

236 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कुछ माननीय सदस्यः नहीं, नहीं।

डॉ. बख्शी टेकचन्दः खैर, यदि प्रत्येक को अपनी इच्छानुसार मत देने की इजाजत दे दी जाती है तो भी इसका अनभिप्रेत प्रभाव पड़ेगा। खैर, मैं इस विधेयक के समर्थकों से पूछता हूँ, मैं अपनी बहनों से पूछता हूँ फ्क्या इस विधेयक से आपके साथ पूरा न्याय होता है? क्या आप यही चाहते हैं? क्या यह आपको वे अधिकार देता है जो आप चाहते हैं?य् इस पर मैं कहता हूँ, ‘नहीं’। मैं पुरज़ोर शब्दों में कहता हूँ, ‘नहीं, यह नहीं देता।’ यह अत्यन्त विकृत और बेमन का विधान है और मैं तो कहूँगा कि इससे हिंदू समाज का अधिकतम अनिष्ट और महिला सदस्यों का न्यूनतम भला होगा।

एक माननीय सदस्यः क्या वे आपके समाधान को मानने के लिए तैयार हैं?

डॉ. बखशी टेकचन्दः मैं नहीं जानता। अब मैं विधेयक के कुछ प्रावधानों की बात करूंगा। विधेयक का एक प्रावधान यह है कि उत्तराधिकार, आदि से सम्बन्धित अध्याय कृषि भूमि के उत्तराधिकार पर लागू नहीं होंगे। क्यों? क्योंकि उस समय जब विधेयक पेश किया गया था, स्थिति यह थी कि 1935 के भारत सरकार अधिनियम की सातवीं सूची की प्रविष्टि के अन्तर्गत यह विधानमंडल यानी भारतीय विधानमंडल, कृषि भूमि के सम्बन्ध में कोई कानून पारित नहीं कर सकता था, क्योंकि यह एक प्रांतीय विषय था। खैर, यह स्थिति उस समय थी। सन् 1938 में डॉ. देशमुख के विधेयक का विस्तार करके उसके अन्तर्गत कृषि भूमि को भी लाया गया। तत्पश्चात् यह मामला संघीय न्यायालय के समक्ष गया और संघीय न्यायालय सहमत हो गया कि यह भारतीय विधानमंडल के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। यह था न्यायालय का निर्णय और यह था भारत सरकार अधिनियम के उक्त खंड का प्रावधान। अतः श्री बी.एन. राउ और उनकी समिति डॉ. अम्बेडकर तथा उनके विधि विभाग द्वारा इसका लोप स्वाभाविक ही था। उनका कहना था कि वह मामला प्रत्येक प्रांतीय विधानमंडल पर छोड़ना पड़ेगा और वे ही इसे निपटायेंगे। लेकिन सौभाग्य से उस समय संविधान सभा की प्रारूप समिति ने अपने प्रारूप-संविधान का प्रकाशन किया। प्रारुप संवधिन में कहा गया है कि सातवीं अनुसूची की उस प्रविष्टि में संशोधन किया जाये ताकि इसे समवर्ती सूची में सम्मिलित किया जा सके अथवा इसे एक समवर्ती विषय बनाया जा सके। अर्थात् चल अथवा अचल सम्पत्ति पर उत्तराधिकार के विषय में कृषि भूमि भी शामिल हो। तब यही प्रावधान था। मैंने उस समय अपनी विरोधी टिप्पणी और प्रसार समिति में भी यह सुझाव दिया था कि हमें कुछ महीने प्रतीक्षा करनी चाहिये ताकि हम महिलाओं को अपने पिता या पति की सम्पत्ति में हिस्सा देने के लिए जो भी उपाय करें, वे सभी प्रकार की सम्पत्तियों पर लागू होने चाहिये। आप विधि में एकरूपता लाना चाहते हैं। और मैं यह बताना चाहता हूँ कि एकरूपता के बजाय आपको विविधता मिलेगी और एकता के बजाय आपको गड़बड़ी हाथ लगेगी। यदि यह प्रावधान पारित कर दिया गया होता तो स्थिति यह होती कि यदि