239
में उसको हिस्सा नहीं मिलेगा। यह बात हुई तो शहरी सम्पत्ति तो और भी कम हो जायेगी। कुछ धनवान लोगों को छोड़कर, 30 करोड़ हिंदुओं में से कितने व्यक्तियों के पास एक रिहायशी मकान से अधिक सम्पत्ति है जिसमें पूरा परिवार रहता हो? सामान्य तौर पर देहातों में एक छोटा-सा मकान होता है और थोड़ी-सी जमीन होती है और यदि कोई व्यक्ति व्यापारी हो, तो उसके पास एक छोटी-सी कच्ची दुकान भी हो सकती है। यदि आप रिहायशी मकान को लड़की के उत्तराधिकार के मामले को लेकर अलग कर देते हैं तो आप उसकी सम्पत्ति से एक और टुकड़ा निकाल लेते हैं।
एक अन्य आपत्ति यह है कि यदि दामाद को परिवार में शामिल करने की व्यवस्था की जायेगी और आमतौर पर होता यह है कि वे अनेक समस्याएं खड़ी कर देते हैं और चूंकि वे एक अन्य ग्राम में सम्पत्ति का रखरखाव नहीं कर पाएँगे, इसलिए वे किसी स्थानीय व्यक्ति को वह सम्पत्ति बेचने की व्यवस्था कर देंगे। इसके परिणामस्वरूप परिवार की व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जायेगी। ऐसी स्थिति से निपटने के लिये सुझाव दिये जा रहे हैं कि निःसंदेह बेटी को हिस्सा मिलेगा परन्तु वह सम्पत्ति के मूल्य के रूप में होगा। फिर आपको विवाह के एक या दो वर्ष के भीतर सम्पत्ति खरीदने का पहला अधिकार भाइयों को देना होगा। इस प्रकार भाई अपनी बहन को या उसके पति को उसके हिस्से की कीमत दे सकेगा और सम्पत्ति को अपने पास रख सकेगा। इस व्यवस्था में भी काफी कठिनाई पैदा हो सकती है। सम्पत्ति का बाजार के अनुसार मूल्य सुनिश्चित करना बहुत मुश्किल होगा और इसके परिणामस्वरूप लम्बी मुकदमेबाजी होगी और वह लम्बी मुकदमेबाजी चलती रहेगी फलतः बेटी को कुछ हासिल नहीं होगा। कृषि भूमि और रिहायशी मकान को अलग कर दिया जायेगा और अनेक अन्य चीजें इसमें जुड़ जायेंगी। यह कहा जा सकता है कि पूरा हिस्सा बहुत अधिक है, उसको आधा दे दो, या चौथाई दे दो तो मैं पूछना चाहता हूँ कि उसको पूरा हिस्सा क्यों न दिया जाये?
यदि आप विधेयक का शान्तिपूर्वक और धैर्यपूर्वक विश्लेषण करें और स्मृति को आधार न मानें, जिसको ईश्वरीय देन माना जाता है, तो पता चलेगा कि इससे महिला उत्तराधिकारियों को न्यूनतम लाभ भी नहीं प्राप्त होगा।
यह विधेयक संयुक्त हिंदू परिवार का सर्वनाश कर देगा, चाहे वह व्यवस्था अच्छी है या बुरी, लोग इसको उचित ही मानते हैं। हमारे सम्मान योग्य भाई श्री अल्लादी कृष्णामूर्ति अय्ययर ने कल बताया था कि मद्रास में, देहातों में यह व्यवस्था अब भी प्रचलित है। हमारे मित्र श्री संथानम अपना भिन्न विचार रख सकते हैं। परन्तु यह व्यवस्था प्रचलित है और कुछ लोग इसको अच्छा समझते हैं। ऐसे लोगों का अनुपात न्यूनाधिक हो सकता है। हिंदू विधान के सभी अन्य सिद्धांतों को जैसे कि उत्तरजीविता, उत्तराधिकार, बेटे का हिस्सा, आप इन सबको समाप्त करने जा रहे हैं। इसकी क्या आवश्यकता है? आवश्यकता इस बात की है कि बेटी को हिस्सा मिलना चाहिए। अतः मेरा निवेदन यह है कि विधेयक