(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 255

240 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के भाग 5, 6 और 7 में हिंदू परिवार व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन करने की व्यवस्था है। अतः विधेयक के प्रस्तुत रूप से महिलाओं को न्यूनतम लाभ मिलेगा।

अतः मैं विधेयक का समर्थक करने वालों से पूछना चाहूँगा कि क्या इस विधेयक पर इसी अवस्था में कल अथवा आगामी सत्र में अन्तिम मतदान करवाना आवश्यक है? क्या इस पर गहराई से और विचार करना वांछनीय नहीं होगा जिससे किसी ऐसे अन्य तरीके का पता लगाया जा सके, जिससे संयुक्त हिंदू परिवार जो मिताक्षर अथवा दायभाग के नियमों के अधीन आते हैं कि महिला सदस्यों के लिये पूरा लाभ सुनिश्चित किया जा सके, साथ ही देश के विभिन्न भागों में प्रचलित प्रणालियों में कम से कम फेर-बदल करना पड़े।

मैंने परंपरावादी और सुधार के इच्छुक, दोनों पक्षों से अनुरोध किया है। मैं सिर्फ एक सुझाव देना चाहता हूँ। मैंने अपने मन में कोई निश्चित योजना नहीं बनायी है, इसमें काफी समय लगेगा। परन्तु मैं उसकी मोटी रूपरेखा आपके समक्ष रखूंगा। और फिर डॉ. अम्बेडकर, विधि के जानकार अन्य सदस्यों, सुधारों का पक्ष लेने वालों और परंपरावादी सदस्यों से पूछना चाहूँगा कि क्या यह विकल्प विचार करने योग्य है या नहीं? वास्तव में, आज सुबह तक मैं इस विषय पर बोलने से संकोच कर रहा था और मैं उस समिति के समक्ष अपने विचार रखना चाहता था जिसके शीघ्र ही गठन किये जाने का आश्वासन दिया गया था और मेरा विचार था कि यदि मुझे उस समिति का सदस्य बनाया गया, तो मैं अपने विचार उसके समक्ष रखूंगा। परन्तु आज जब मेरा नाम बोलने के लिए पुकारा गया, तो मैंने सोचा कि सभा के समक्ष ही अपना विचार रखना बेहतर होगा। मेरा सुझाव निम्नलिखित है।

हमारा उद्देश्य क्या है? हमारा उद्देश्य यह है कि परिवार के महिला सदस्यों को सम्पत्ति का पूरा अधिकार मिलना चाहिए। इस संबंध में हमें क्या करना चाहिए? संयुक्त परिवार में कोई उथल-पुथल करने की आवश्यकता नहीं, उत्तराजीविता की विधि को बरकरार रहने दीजिए। इस व्यवस्था को चलने दीजिए जब तक वह चलती है या चलायी जा सकती है। परन्तु जैसे ही किसी महिला का विवाह हो जाये, मिताक्षर परिवार में उसको सम्पत्ति में सहभागी बना देना चाहिए। इस समय वह संयुक्त परिवार की सदस्या है। परन्तु सम्पत्ति में उसकी साझेदारी नहीं है। मैं माननीय सदस्यों से अनुरोध करता हूँ, कि मुझे उनके समक्ष अपना प्रस्ताव रखने हेतु केवल तीन मिनट का समय दिया जाए, फिर आप उस पर विचार करें। इसमें व्यवधान डालने से कोई बात नहीं बनेगी। यह आपके और समिति के विचारार्थ प्रस्ताव मात्र हैं, माननीय विधि मंत्री, प्रधानमंत्री तथा अन्य सदस्य, जिनकी इस विषय में रुचि हो, वे इस पर विचार करें। अब तक, प्रत्येक महिला विवाह के बाद अपने पति का गोत्र ग्रहण कर लेती है और वह संयुक्त परिवार की सदस्य बन जाती है। परन्तु उसके अधिकार बहुत सीमित होते हैं। वर्ष 1937 तक,