(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 256

241

ब्रिटिश काल के विधि न्यायालय द्वारा प्रदत्त अधिकार जो उसको मिलते थे, भरण-पोषण तक सीमित थे। उसका सम्पत्ति में कोई कानूनी अधिकार नहीं था। वह उस सम्पत्ति में केवल रहने का लाभ उठा सकती थी।

यही स्थिति थी। वर्ष 1937 में देशमुख अधिनियम बना, उसमें लिखा था कि पति की मृत्यु हो जाने पर वह उतने ही हिस्से की हकदार रहेगी जितना उसके पति का था और यदि वह परिवार में देवर, ज्येष्ठ अथवा अन्य सदस्यों के साथ नहीं रहना चाहेगी, तो वह अपना हिस्सा अलग भी करवा सकेगी। मैं कहना चाहता हूँ कि उसमें केवल एक बात और जोड़ दीजिए कि वह उस सम्पत्ति में पूरी सहभागिनी होगी। जैसा कि मिताक्षर परिवार में होता है कि जैसे ही एक पुत्र का जन्म होता है वह पिता की पैतृक सम्पत्ति का अधिकारी बन जाता है और जन्म लेते ही सहभागी हो जाता है। इसी प्रकार विवाह होते ही महिला को भी पूरे अधिकारों के साथ सहभागिनी बन जाना चाहिए। परिवार में उसके अपने बेटे भी हो सकते हैं और अन्य लोग भी। वे सब बिना अलग हुए इकट्ठे मिलकर रह सकते हैं, परन्तु यदि वह सोचती है कि उनके साथ मिलकर इकट्ठे रहना सम्भव नहीं है, तो वह अपना हिस्सा अलग करवा सकती है जैसा कि 1937 अधिनियम के अधीन उस महिला के पति की मृत्यु के बाद करवाया जा सकता है। एक तो यह परिवर्तन है। यदि आप ऐसा कर देते हैं तो पिता की सम्पत्ति अस्त-व्यस्त नहीं होगी और संयुक्त परिवार भी छिन्न-भिन्न नहीं होगा। संयुक्त परिवार चलता रहेगा, जब तक वह चल सकता है। किसी ने कहा था कि यह व्यवस्था समाप्त होती जा रही है। किसी अन्य ने कहा था कि यह आयकर प्रयोजन के लिये समाप्त हो रही है। किसी अन्य ने यह पूछा था कि कितने लोग आयकर देते हैं और कहा कि संयुक्त परिवार व्यवस्था में रहते हुए भी 99.5 प्रतिशत हिंदू लोग आयकर नहीं देते। ये तर्क निरर्थक हैं। यदि इन परिस्थितियों में सयुक्त परिवार व्यवस्था समाप्त होती जा रही है, तो होने दीजिये। परन्तु जब तक यह व्यवस्था चलती है, चलने दीजिए।

मैं जो सुझाव दे रहा हूं वह न तो नया है और न ही हिंदू विधान की भावना के विरुद्ध है। मेरे विचार में यह मूल विधान, अर्थात् वेदों का विधान अथवा जैमिनी तथा अन्य विद्वानों द्वारों प्रतिपादित शास्त्रों में उल्लिखित विधान के अनुरूप है। मैं अपने भाषण को लम्बा नहीं करना चाहता। परन्तु मैं कहना चाहता हूँ, कि वैदिक काल में तथा उसके बाद स्थिति क्या थी। आप कृपया वर्ष 1913 में द्वारका नाथ मित्तर की हिंदू विधान में महिलाओं की स्थिति (द पोजीशन ऑफ वीमेन इन हिन्दू लॉ) पर प्रकाशित पुस्तक के कुछ भागों को पढ़ें। आप कृपया इलाहाबाद के स्व. डॉ. सतीशचन्द्र बनर्जी, जो इस देश के सुप्रसिद्ध और बेहद होनहार वकील हुए हैं, परन्तु दुर्भाग्य से जिनकी अल्प-आयु में ही मृत्यु हो गयी, के इलाहाबाद लॉ जर्नल के खंड ग्यारह में विद्तापूर्ण लेख को पढ़ें। यह बहुत ही विस्तृत लेख है। आप पटना के डॉ. बिस्वास, की पुस्तक को भी पढ़ें। इन सब