242 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
में वेदों से उद्धरण दिये गये हैं और उन्होंने उन अन्य विद्वानों के विचारों का भी उल्लेख किया है, जो मनु से पहले हुए हैं और जिन्होंने बताया है कि उस काल में महिलाओं की स्थिति क्या थी। वह अपने पति की सम्पत्ति की पूरी मालिक मानी जाती थी। महर्षि जैमिनी का कहना है, वेदों पर भाष्य लिखते हुए वह कहते हैंµफ्विवाह हो जाते ही पत्नी धन की अधिकारिणी बन जाती है और उसका पति जो भी अर्जित करता है, वह उसका हो जाता है।य् इसका अभिप्राय यह है कि वह पूरी सहभागिनी बन जाती है। फिर, एक अन्य पाठ के सम्बन्ध में अपने विचार रखते हुए वह कहते हैं कि महिला को न केवल पुरुषों की तरह ही धार्मिक और सिविल अधिकार मिल जाते हैं, बल्कि वह अपने पति द्वारा अर्जित सम्पत्ति का उपयोग भी कर सकती है। वह अपने पति द्वारा अर्जित सम्पत्ति पर नियंत्रण और उसका विन्यास भी कर सकती है। हमारे यहां सहभागी की यह संकल्पना थी। जैसे पुत्र जन्म लेते ही पिता की सम्पत्ति का भागीदार बन जाता है और उसे अन्तरण का अधिकार भी प्राप्त हो जाता है, बशर्ते कि वह परिवार की आवश्यकताओं अथवा उचित प्रयोजन के लिये हो, वही अधिकार महिला की उसके विवाह हो जाने के समय से ही मिल जाने चाहिए। मेरा निवेदन है कि हमें वेदों के प्राचीन पाठ का और प्राचीन हिंदू विधान का अध्ययन करना चाहिए और जानना चाहिए कि अवनति का काल वह कौन-सा था, जब उसके अधिकार कम कर दिये गये। उससे पूर्व महिला का कितना सम्मान था, अतः हम उसको सहभागिनी बनायें। मेरे सुझाव का एक भाग यह है।
मेरे सुझाव का दूसरा भाग यह है, जैसा कि सर अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर ने कहा कहा था कि किसी महिला को अपनी सम्पत्ति को अलग करवाने का पूरा अधिकार होना चाहिए, अतः हिंदू विधवा की उस काल्पनिक प्रस्थिति को समाप्त कर देना चाहिए। इस सम्बन्ध में, मैं सभा से निवेदन करना चाहता हूँ कि वे इस विषय पर दो मिनट विचार करें। जो मेरे मित्र इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं, उनका कहना है कि हम शास्त्रों में उल्लिखित बातों पर ध्यान दे।। हम भी उनसे और परे नहीं जाना चाहते, विशेषकर, मिताक्षर से जिसका पालन इस देश में होता है। बंगाल को छोड़कर सारा देश इसका पालन करता है। इस मुद्दे के संबंध में मिताक्षर का विधान क्या कहता है? मैं चाहता हूँ कि आप विज्ञानेश्वर के याज्ञवल्क्य पर भाष्य के अध्याय 2, भाग 11 के छंद 2 और 4 को पढ़ें और देखें कि महिला के ‘स्त्रीधन’ के बारे में उसमें क्या कहा गया है। कुछ बातों को उद्धृत करने के पश्चात्, जैसे विवाह के समय महिला को उपहार स्वरूप जो कुछ दिया जाता है, जो अधिक महत्वपूर्ण नहीं है, उसमें कहा गया है कि फ्और उसके अतिरिक्त स्त्रीधन में, उत्तराधिकार, विभाजन, अभिग्रहण (प्रतिकूल कब्जे द्वारा) आदि-आदि से प्राप्त धन भी शामिल है।’’ कहने का अभिप्राय यह है कि किसी महिला का अपने पति अथवा पिता या किसी अन्य व्यक्ति से प्राप्त सम्पत्ति पर पूरा स्वामित्व होना चाहिए, उस पर किसी अन्य व्यक्ति से प्राप्त सम्पत्ति पर पूरा स्वामित्व होना चाहिए, उस पर किसी और का कोई नियन्त्रण नहीं होना चाहिए। 11वीं शताब्दी में विज्ञानेश्वर द्वारा इसी विधि