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का उल्लेख किया गया था। अंग्रेजों के शासनकाल के आरम्भ से पूर्व तक यही विधान प्रचलित भी था। बनारस विचारधारा के एक भाष्यकार एन.एस. विरामतधीर ने भी इसी बात को दोहराया है। मयूज्ञ के लेखक नीलकंठ, जिसको बम्बई प्रान्त विशेषकर गुजरात और बम्बई द्वीप का प्रमुख प्रमाणिक व्यक्ति माना जाता है, भी इसी बात को दोहराते हैं। ब्रिटिश शासन के प्रारंभ से पूर्व बंगाल को छोड़कर, लगभग सभी प्रांतों में यही कानून था। जब अंग्रेज आये, उन्होंने कहा, फ्ठीक है, हम ‘मिताक्षर’ के मूलपाठ का अध्ययन करेंगे। उन्होंने कहा कि यह याज्ञवल्क्य के लेखन पर भाष्य है। याज्ञवल्क्य ने कुछ शब्दों का उपयोग किया है और विज्ञानेश्वर ने याज्ञवल्क्य द्वारा प्रयुक्त ‘आदि’ शब्द की व्याख्या की है। स्थिति यह है कि इस सम्बन्ध में काफी खींचतान चलती रही। निःसंदेह कुछ न्यायालयों में भी, विशेषकर, मद्रास में, अनेक वर्षों तक मामला चलता रहा। परन्तु अन्त में प्रिवी कौंसिल ने कहा फ्ठीक है, हमें इसको लागू करना चाहिए,य् यद्यपि यह प्रिवी कौंसिल द्वारा स्वयं उल्लिखित नियम के बिल्कुल विपरीत था कि यदि स्मृतिकार और भाष्य में अन्तर हो, तो हम भाष्यकार के कथन को ही स्वीकार करेंगे। उन्होंने स्वयं यह नियम निधारित किया था, परन्तु, बाद में, वे ही इस नियम से हट गये।
इसलिये मेरे विचार में हमें पुत्री के और पति के परिवार के सम्बन्ध में उसी स्थिति को अपनाना चाहिए जो वैदिक काल में थी और मिताक्षर व्यवस्था के अनुसार उसका पालन करना चाहिए। हमें उस विशाल न्यायिक साहित्य को अधिक महत्व नहीं देना चाहिए जो इस अवधि के दौरान इस देश में रचा गया है। हमें 18वीं शताब्दी तक प्रचलित विधि को अपनाना चाहिए। यदि आप इन दो बातों को स्वीकार कर लें तो मैं अपने मित्रों, इस विधेयक के समर्थकों, सुधार में पक्षधरों को बताना चाहता हूँ कि इससे बहुत अधिक लाभ होगा कि महिला पति के परिवार में सहभागिनी बनीं जाती है। आप संयुक्त परिवार को छोड़ दें। बेटे अपने परिवार में चलते रहें। इस व्यवस्था में कुछ अच्छाइयों और कुछ बुराइयों हो सकती हैं, परन्तु आप इसे अपने आप टूटने दीजिए और स्वतः समाप्त होने दीजिए। परन्तु महिला को अपने पति के परिवार में सम्पत्ति का हक दीजिए, बिल्कुल वही हक जो बेटे या पति को प्राप्त होता है। इसके बाद कुछ और बातें भी उठ सकती हैं कि उस महिला की मृत्यु के बाद उसकी सम्पत्ति की स्थिति क्या होगी, आदि आदि, परन्तु मैं अभी इनके सम्बन्ध में कुछ नहीं कहना चाहता। मैं माननीय सदस्यों से अनुरोध करूंगा कि वे इस विषय पर गम्भीरतापूर्वक विचार करें और फिर तय करें कि क्या यह योजना बेहतर नहीं है।
जहां तक अविवाहित बेटी का सम्बन्ध है, मैं इसका कोई कारण नहीं समझता कि उसको पिता की सम्पत्ति में भाइयों के बराबर पूरा अधिकार क्यों न मिले, क्योंकि उसको दहेज आदि कुछ नहीं मिला है और उसको किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। हमारे कुछ मित्रों ने भाई-बहन के प्रेम की सुन्दर तस्वीर खींची है जो भाई बहिन से करता है और भाई किस प्रकार उत्साहपूर्वक बहिन के विवाह की व्यवस्था करते हैं। निश्चय ही