246 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सर बी.एन. राउ द्वारा 1944 में तैयार किये गये मूल विधेयक और 1945 में उन्हीं द्वारा पुनरीक्षित विधेयक में अन्तर है। मैं कहना चाहता हूँ कि सिविल विवाह के सम्बन्ध में आपने वर्तमान विधि को बनाये रखा है जो वही अधिकार प्रदान करता है जो यह विधेयक प्रदान करता है। परन्तु सांस्कारिक रीति से सम्पन्न विवाह को सिविल विवाह के रूप में बदलने के लिये प्रावधान करने का प्रयास न करें। सांस्कारिक को सांस्कारिक ही रहने दें। जो बातें मूलतः कही गयी थीं और जिनकी अनुमति प्राचीन स्मृतिकारों ने भी दी है। तलाक में नियमों की परिधि बहुत सीमित रहनी चाहिए। इस बारे में मैं बी. एन. राउ का विचार यह थाः
विवाह के समय नपुसंकता, जो तलाक के समय तक विद्यमान हो। यह एक ऐसी शर्त है जिस पर कोई भी समझदार व्यक्ति आपत्ति नहीं कर सकता।
इसी तरह कोई व्यक्ति पागल हो और इस तथ्य का बाद में पता चला हो। यह दूसरा प्राकृतिक पहलू है जिसके सम्बन्ध में कोई झगड़ा नहीं किया जा सकता।
इन दो शर्तों के अतिरिक्त आप तलाक की अनुमति तब दे सकते हैं, जब कोई व्यक्ति अपना धर्म बदल ले। कोई हिंदू, मुसलमान बन जाये और शादी कर ले। हमारे हिंदू विधान में विवाह की संकल्पना के अनुसार, विवाह हो जाने के बाद विवाह-विच्छेद नहीं हो सकता और धार्मिक रीति का अस्तित्व बना रहेगा, पत्नी कुछ नहीं कर सकती। अतः आप किस सिद्धान्त के अनुसार वैसा कर सकते हैं जब पति ने अपना धर्म बदल लिया हो और दूसरे धर्म को अपना लिया हो और उसी धर्म के अनुसार अन्य स्त्रियों से विवाह कर लिया हो?
श्री महावीर त्यागीः क्या इसका परिणाम यह नहीं होगा कि जब कभी किसी को तलाक की आवश्यकता पड़ेगी, तो वह नियमित कानूनी प्रणाली का रास्ता न अपनाकर अपना धर्म ही बदल लेगा?
डॉ. बख्शी टेक चन्दः नहीं, ऐसे व्यक्ति अपना धर्म परिवर्तन नहीं करेंगे। उपर्युक्त शर्तों के अतिरिक्त आप उसमें, कुछ अवधि के लिये उदाहरणार्थ 5 वर्ष, 6 वर्ष अथवा 7 वर्ष के लिये महिला का परित्याग, जोड़ सकते हैं। ये शर्तें कोई नहीं नहीं हैं। प्राचीन स्मृतिकारों को भी इनकी जानकारी थी। इन तीन या चार परिस्थितियों में ही तलाक की अनुमति दी जानी चाहिए। क्या हमने ऐसे मामले देखे नहीं हैं, जिनमें पति विवाह करने के पश्चात् अपनी पत्नी को छोड़ देता है? क्या ऐसी दुर्भाग्यवान महिलाओं की समस्या का कोई समाधान नहीं होना चाहिए? उनका समाधान अवश्य होना चाहिए। परन्तु इसमें मुकदमेबाजी को नहीं जोड़ा जाना चाहिए। यदि कोई मामला परस्त्री गमन का हो, तो साक्ष्य जाली भी हो सकता है। कोई सांठ-गांठ वाला साक्ष्य पेश किया जा सकता है और आरोप को सिद्ध किया जा सकता है। परन्तु मेरे विचार में यह बात धार्मिक