252 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अन्तर किये बिना आपको सभा में सब पर और समान रूप से ध्यान देना चाहिए।
माननीय उपाध्यक्षः माननीय सदस्य ने मुझे पूरी तरह गलत समझा है। जब कभी कोई ऐसा विधेयक सभा में चर्चा के लिये आता है जो कुछ समुदायों को प्रभावित करता है, दुर्भाग्य से इस देश में अनेक समुदाय हैं, तो सभी समुदायों के प्रतिनिधियों को अपने विचार व्यक्त करने का अवसर दिया जाना चाहिए। यदि माननीय सदस्य इस विधेयक को पढ़ें तो उनको पता चलेगा कि यह विधेयक जैन और सिक्ख समुदायों को भी प्रभावित करता है। इस विषय पर अनेक हिंदू अपने विचार व्यक्त कर चुके हैं और अब मुझे कुछ जैन और सिक्ख सदस्यों को बोलने का अवसर देना चाहिए। मदवार चर्चा करने से पूर्व हमें उनके विचार भी जान लेने चाहिए।
श्री महावीर त्यागीः मैं विरोध व्यक्त करता हूँख्...,
माननीय उपाध्यक्षः मैं यह सहन नहीं कर सकता। माननीय सदस्य को यह ध्यान रखना चाहिए कि इस प्रकार की भाषा का प्रयोग करना उचित नहीं है।
ऽप्रो. के.टी. शाह (बिहारः सामान्य)ः महोदय, आरम्भ में, जब यह विधेयक प्रस्तुत किया गया था और सभा में प्रस्ताव रखा गया था, तो इस वाद-विवाद में भाग लेने का मेरा कोई इरादा नहीं था। परन्तु अब चूंकि इस विषय पर काफी चर्चा हो चुकी है और सभा में भिन्न-भिन्न विचार रखे जो चुके हैं, और पार्टी की ओर से अपना मत व्यक्त करने की स्वतंत्रता है तो मैं समझता हूँ कि इस प्रस्ताव तथा इस विधेयक के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करने ही चाहिए। और मुझे विश्वास है कि विधि मंत्री और उनके सहयोगी उन पर विचार करेंगे।
महोदय आपने कृपा करके मुझे एक जैन के रूप में अपने विचार व्यक्त करने का अवसर प्रदान किया है। यहां पर मैं सभा के एक सदस्य के रूप में खड़ा हूँ और मैं किसी समुदाय विशेष के सदस्य के रूप में किसी विशेषधिकार का दावा नहीं करता। मैं अपने आपको एक भारतीय नागरिक स्वीकार करता हूँ और इस प्रकार की चर्चा में भाग लेने के लिये किसी धर्म में अपने विश्वास को कोई योग्यता या अयोग्यता नहीं समझता। मैं केवल इस सभा के सदस्य के रूप में बोलता हूँ।
सार्जेन्ट रोहिणी कुमार चौधरीः मेरा एक व्यवस्था का प्रश्न है। महोदय, आपने प्रो. शाह को जैन समुदाय की ओर से बोलने के लिये आमंत्रित किया है, परन्तु उनका कहना है कि वह जैन समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते।
माननीय उपाध्यक्षः यह व्यवस्था का प्रश्न नहीं है।
ऽसी.ए. (विधि) डी., खंड 6, भाग II, 14 दिसम्बर, 1949, पृष्ठ 602-607