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प्रो. के.टी. शाहः इसके साथ मुझे यह भी कहना है कि मैं इस विधेयक में निहित उपबंधों का आमतौर पर समर्थन करना चाहूंगा, यद्यपि मैंने विरोधी पक्ष बनाने का प्रयास किया है जिसे अभी तक मान्यता नहीं मिली है। अब जैसी भी स्थिति है विरोधी पक्ष का सदस्य होते हुए और संविधान के प्रत्येक उपबंध का निरन्तर विरोध करने वाला व्यक्ति होते हुए भी इस सरकार द्वारा संरचना के सम्बन्ध में अथवा सुधार लाने के लिये विधान के स्तर पर किये गये प्रत्येक प्रयास का विरोधी होते हुए भी अब मैं इस विधेयक के सम्बन्ध में बिना शर्त समर्थन दे रहा हूँ। अतः मेरा ऐसा विश्वास है कि उसकी उचित सराहना की जायेगी। यदि सरकार इस पुरातन कथन पर विश्वास न करे कि शैतान भी उपदेश दे सकता है और मुझ से प्राप्त प्रत्येक समर्थन को संदेहास्पद समझा जाये, तो भी इसका स्वागत किया जाना चाहिए। यदि उनका विचार यह नहीं है तो इस विधेयक का विरोध जितना कि मैं चाहता हूँ कम से कम उससे अधिक ही प्रभावी होगा।
महोदय, इस प्रकार के विचार रखते हुए और इस रूप में अपना सहयोग प्रदान करते हुए मैं विनम्रतापूर्व इस सभा का पूरा सम्मान करते हुए कहना चाहूंगा कि हमारे बीच में परिहास को उचित संदर्भ में नहीं समझा जाता। अतः मैं किसी ऐसे शब्द या दृष्टान्त का उल्लेख नहीं करूंगा जिससे इस चर्चा में कोई हल्कापन आये। मैं इस विषय को हमारे देश के अस्तित्व के लिये बहुत महत्वपूर्ण समझता हूँ। इस विधेयक के दूरगामी परिणाम निकलेंगे और इसलिये मैं अपने भाषण में किसी ऐसे शब्द या दृष्टान्त का सहारा नहीं लूंगा, जिससे किसी पर्यवेक्षक, बाहर के व्यक्ति या किसी छात्र पर कोई ऐसा प्रभाव पड़े कि हम इस मामले को गंभीरता से नहीं ले रहे।
ये टिप्पणियां कर चुकने के बाद मैं कुछ आपत्तियों पर विचार करना चाहूंगा, जो इस विषय पर हैं या विधेयक के मूल सिद्धांतों के सम्बन्ध में की गई हैं। महोदय, इस बात की चुनौती भी दी गयी है कि क्या यह संस्था इस प्रकार के विषय से निपटने में सक्षम है, क्या इस विधेयक में निहित विषय पर विचार करने के लिये इस सभा को समादेश मिला है? क्या इस विषय की तत्कालिकता पर्याप्त है, ताकि इस प्रस्ताव से शीघ्र निपटा जा सके। कम से कम मुझे इस संस्था की क्षमता के बारे में कोई संशय नहीं है कि वह इस प्रकार के मामलों से निपट सकती है। मुझसे ठीक पहले बोलने वाले सदस्य ने भी अनेक दृष्टांत दिये हैं जिनमें इस सभा में विधायी उपायों के माध्यम से प्रस्ताव रख कर संविधान सहित अनेक मूल ढांचे सम्बन्धी परिवर्तन के बारे में प्रस्ताव लाये गये और पारित भी किये गये हैं। इससे पहले विधान मंडल ने, जो इतना प्रभुसत्ता सम्पन्न नहीं था, जितना कि यह अब है, बहुत महत्वपूर्ण सुधार किये थे और इस लिये इस प्रकार के मामलों से निपटने के लिये इस विधानमंडल के सक्षम होने का प्रश्न मुझे अशोभनीय एवं अप्रासंगिक लगता है और कहना होगा कि वह इस सभा के लिये सम्मानजनक भी नहीं है, यद्यपि यह भी बिल्कुल सच है कि इस विषय को निर्वाचक-मंडल के समक्ष नहीं