(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 270

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जब मैं यह कहता हूं तो यह नहीं समझना चाहिए कि इस मामले को अनिश्चित काल के लिये स्थगित कर दिया जाए। मैं तो चाहता हूँ कि यह संस्था, जिसकी प्रभुसत्ता के बारे में मुझे कोई संदेह नहीं है, वह इस विषय पर निश्चित रूप से और आखिरी तौर पर निर्णय ले। यद्यपि मैं एक माननीय सदस्य द्वारा दिये गये तर्क को पूरी तरह समझता हूँ कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि दूसरा सदन हमारे निर्णय को, यदि हम अपना निर्णय दे भी देते हैं, स्वीकार कर लेगा। मेरा विचार यह है क जब कोई जगह तैयार कर ली जाती है, एक बार चिन्ह संकेतक लगा दिया जाता है, एक बार कोई सड़क बन जाती है तब इंजन को उलटा चलाना और पीछे ले जाना कठिन हो जाता है। तथापि यह बात विश्वास की है, तर्क की नहीं। इस मामले में बौद्धिक विचार की अपेक्षा, सामान्य विश्वास का अधिक महत्व है और इसलिये मैं इस विषय पर खुले दिल से विचार करता हूँ। फिर भी मुख्य बातों को ध्यान में रखते हुए, जो इस विधेयक में उल्लिखित गुण-दोष के संबंध में कही गयी हैं मैं विधेयक की अनेक धाराओं, अनेक अध्यायों या अनेक उपबंधों का विरोध करने वालों का समर्थन नहीं कर सकता। जहां तक मैं समझ पाया हूँ, इस विषय में मुख्य समस्या महिला की स्थिति को लेकर है। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि मैं इस चर्चा में किसी प्रकार का छिद्वलापन लाने के पक्ष में नहीं हूँ। इसलिये इस वाद-विवाद के दौरान अब तक जो तर्क दिये गये हैं या मुद्दे उठाये गये हैं, मैं उससे कोई विशेष प्रभावित नहीं हुआ हूँ। हम धर्म, लिंग, जाति या सम्प्रदाय का कोई विचार किये बिना एक ऐसा राष्ट्र बना बना रहे हैं, जिसमें सभी नागरिक समान समझे जायेंगे। यदि यही सिद्धान्त है जिसे हम बुनियाद बनाना चाहते हैं, यदि हमारे संविधान का यही आमुख है और जीवन का दिशानिर्देश है, जिस पर हमें देश का निर्माण करना है, तो मेरा विचार यह है कि इस विधेयक के उपबंध संविधान के आमुख में उज्ज्वल आदर्शों के अनुरूप हैं और इसलिये अब हम जो भी प्रस्ताव करते हैं, यदि वह उन उपबंधों से भिन्न हैं या विपरीत हैं, तो उसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। इस विधेयक में परिवारिक सम्बन्धों में, उत्तराधिकार, सम्पत्ति, विवाह या विवाह-विच्छेद के सम्बन्ध में महिला को समानता का दर्जा दिलाने का जो प्रयास किया गया है, वह अब पूरे विश्व में व्यापक परिस्थितियों के अनुरूप ही नहीं, बल्कि हमारे समाज में अपनायी जा रही प्रवृत्तियों के भी अनुरूप हैं। मेरे विचार में ऐसा करते हुए वास्तविक स्थिति को पूरी तरह समझ लिया गया है और सब ओर घट रही घटनाओं का भी ख्याल रखा गया है। यह सच है कि युगों से विवाह को एक पवित्र व्रत समझा जाता रहा है परन्तु, जहां तक मैं समझता हूँ, विधेयक में ऐसी कोई बात नहीं है यदि कोई व्यक्ति आज भी विवाह को पवित्र व्रत समझता है तो उसको इस विधेयक से कोई रुकावट पड़ती हो। मैं समझता हूँ कि किसी बात को पवित्र मानना हमारे दिल का मामला है, इसमें किसी दूसरे का हाथ नहीं हो सकता। कितने पवित्र कार्य या वचन हैं जो पवित्र होते हुए भी प्रतिदिन तोड़े जाते हैं, बुरी तरह जोड़े जाते हैं, जिससे अपमान भी होता है। ऐसा करने में पवित्र वचन को तोड़ने वालों से सम्बन्धित अन्य व्यक्तियों का भी