(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 271

256 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हाथ होता है। यदि कानून बनाकर पति और पत्नी के सम्बन्ध को कोई विशेष रूप दिया जाता है, जैसा कि इस विधेयक में प्रयास किया गया है तो केवल उसी से पवित्र बन्धन में कोई परिवर्तन नहीं होता। कानून बन जाने से किसी पवित्र बंधन की पवित्रता समाप्त नहीं हो जाती और कानून पत्नी और पति के मिलन को सिविल विवाह या वचनबद्धता की मान्यता दे या न दे, जो इस मिलन में शामिल हैं, और जो इस मिलन के स्वरूप, कृत्यों और उद्देश्यों की बहुत ऊँचे आदर्श के रूप में मानते हैं, वे ऐसा मानते ही रहेंगे। फिर भी यदि कोई ऐसी परिस्थितियां पैदा हो जाएं, जिनके कारण उनका एक साथ रहना असम्भव हो जाये, यदि उस स्थिति में ऊँचे आदर्शों का पालन भी असम्भव हो जाये, तब मै सोचता हूँ कि उस सम्बन्ध को किसी विधि या वाजिब तरीके से समाप्त कर देना बेहतर होगा। यह तरीका निकाला जा सकता है, बजाय इसके परस्पर विवाद चलता रहे और सम्बन्धित व्यक्तियों या उनके बच्चों की दुर्दशा होती रहे। महोदय, इस प्रकार का कोई सुझाव देना कोई अच्छी बात नहीं है कि तलाक देने की आजादी दी जानी चाहिए, बशर्ते कि ये मिलन आदर्श रूप से बने रहें, उसी भावना से ओतप्रोत रहे जिनसे उस मिलन का कार्यान्वयन होता है। परन्तु हम लौकिक सृष्टि में रहते हैं, जिसमें अनेक दुनियावी बातें होती हैं जिनमें मानवीय कमजोरियां भी सम्मिलित हैं और इसलिये यह आशा करना कुछ अधिक ही होगा कि केवल धार्मिक संस्कार, केवल अग्नि के सामने प्रतिज्ञा करने मात्र से हम उस पवित्र मिलन को आदर्श रूप में बनाये रख सकेंगे, जिसमें हमारा विश्वास है।

ऐसे दम्पत्ति को, जहां उत्पीड़न है और बच्चों की दुर्दशा होती है और आपस में भी वर्बरता पूर्ण व्यवहार चलता है, मेरे विचार में कानून ढंग से या किसी अन्य वाजिव तरीके से विवाह-विच्छेद की अनुमति दे दी जानी चाहिए। हमें वास्तविक परिस्थितियों को समझना चाहिए, और वास्तविकता से मुँह मोड़ना उचित नहीं है, अतः ऐसे मामलों में यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि ऐसे विवाह-सम्बन्ध को जारी रखने के बजाय, उसका विघटन श्रेयस्कर होगा। जहाँ सम्बन्धित पक्षों की दुर्दशा होती रहे, उसके बजाय विवाह-विच्छेद हो जाना बेहतर होगा।

इस प्रकार के जो विवाह एकपत्नीक प्रथा के अन्तर्गत होते हैं, मेरे विचार में वे निरन्तर प्रसन्न ही रहना चाहते हैं और ऐसे विवाह सफल भी होते हैं। फिर भी ऐसे अवसर आते हैं जब इसप्रकार के मिलन में कुछ ऐसी बातें हो जाती हैं, जो परिस्थिति विशेष में बर्दाश्त नहीं की जा सकती। कोई भी पक्ष ऐसी परिस्थिति का अनुमान पहले से नहीं लगा सकता। परन्तु ऐसी स्थिति में बिना कोई और काम किये, जिसमें हंगामा हो, आम लोगों के सामने एक-दूसरे को भला-बुरा कहा जाए या अनादर पूर्ण बातें कही जाएँ, उत्तेजना पैदा करके एक-दूसरे को नीचा दिखाया जाये, हमें अपने कानून में कोई ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे ऐसे विवाह को आसानी से विघटन हो सके और जिसमें किसी पक्ष के साथ भी अनावश्यक पक्षपात न हो। इसलिये मेरे विचार में हमें