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उन कारणों, शर्तों या बहानों पर अधिक जोर नहीं देना चाहिए जो किसी अन्य कानूनी व्यवस्था में विवाह-विच्छेद करने के लिये उल्लिखित हैं। मेरे विचार में बेहतर यह होगा कि विवाह-विच्छेद के लिये ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जो आसान हो, सत्य हो और उसके लिये अधिक खर्च न करना पड़े। इस संबंध में पश्चिमी देशों में अपनायी जा रही प्रक्रिया हमारे सामने है। मैं नहीं समझता कि उत्तराधिकार, पैतृक संपत्ति में हिस्से का लाभ उठाने सम्बन्धी मामले इस सभा में इतनी अधिक उत्तेजना पैदा करने के उचित कारण हैं। आखिरकार, हमारे देश में ऐसे लोगों की संख्या कितनी होगी जिनके पास सम्पत्ति है और जो अपने जीवनकाल के बाद ऐसी सम्पत्ति छोड़ जाएंगे? यदि आप किसी मापदंड पर ध्यान दें, जैसे कि आय-कर संबंधी आंकड़े, तो आपको पता चलेगा कि देश में दस लाख से कम लोग ऐसे होंगे जिनकी आय 250 रुपये प्रति मास से अधिक है और इसमें सब लोग आ जाते हैं। केवल वही नहीं, जो आयकर देते हैं बल्कि वे भी जो आयकर से बचने का प्रयास करते हैं या किसी तरह बच जाते हैं।
30 करोड़ जनसंख्या में आय-कर देने वालों की संख्या लगभग 10 लाख होगी या उन पर निर्भर लोगों की संख्या 30 से 40 लाख होगी और इस हिसाब से कुल जनसंख्या के एक प्रतिशत लोग कुछ सम्पत्ति बना सकते हैं। उसका विभाजन हो सकता है या वह साझे माता-पिता के उत्तराधिकारियों के बीच अधिकारों की असमानता या मनमुटाव का करण बन सकती है। वास्तव में, मैं समझ नहीं पाया कि पैतृक सम्पत्ति के विभाजन के मामले में पुत्रियों और पुत्रों की समान अधिकारों की मान्यता के सम्बन्ध में इतनी उत्तेजना पैदा करने की क्या आवश्यकता है? जहां तक मेरा सम्बन्ध है, मैं कहना चाहूँगा, मैं सम्पत्ति बनाने में विश्वास नहीं रखता। मैं उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ जब सम्पत्ति किसी की नहीं रहेगी। समाज द्वारा प्रत्येक व्यक्ति के लिये व्यवस्था की जानी चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति को रोजगार मिले ताकि अपनी आवश्यकताओं को स्वयं पूरी करे। ऐसा दिन जितनी जल्दी आयेगा, समाज के लिये उतना ही बेहतर होगा। मेरे विचार में सम्पत्ति बुराई का स्रोत है जितनी जल्दी इसको समाप्त कर दिया जायेगा, बेहतर होगा। एक वकील ने सम्पत्ति को झगड़े की जड़ माना है। इस प्रकार के विधान की दृष्टि में भी सम्पत्ति के अधिकार को समाप्त किया जाना बेहतर होगा। यदि प्रस्तुत विधेयक में, इस अवस्था में, कोई संशोधन पेश किया जा सकता हो, तो मैं सुझाव दूंगा कि सम्पत्ति से सम्बन्धित सभी खंड समाप्त कर दिये जायें या निकाल दिये जाएं और एक सीधा-सा प्रस्ताव जोड़ दिया जाये कि किसी प्रकार की सम्पत्ति को चाहे जमीन हो या निजी सम्पत्ति हो, सबको समान रूप से बांट दिया जायेगा। इस समय इतना ही काफी होगा और हमें प्रयत्न करना चाहिए कि ऐसा दिन शीघ्र आये, जब सम्पत्ति का अधिकार समाप्त कर दिया जाये और प्रत्येक व्यक्ति को रोजगार का समान अधिकार उपलब्ध हो, जीवन के एक निश्चित स्तर तक पहुंचने का अधिकार मिले। यह स्तर वैसा ही होगा जो पैतृक सम्पत्ति पाने वालों को प्राप्त है।