(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 273

258 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इन दो महत्वपूर्ण मामलों अर्थात् विवाह और उत्तराधिकार के सम्बन्ध में मुझे यह कहना है कि विधेयक में उतनी ही व्यवस्था है जितनी विद्यमान परिस्थितियों में अपेक्षित है। यदि और जब आप व्यक्तिपरक समाज बनाए रखना चाहते हो, यदि और जब तक आप सम्पत्ति को सामाजिक व्यवस्था की बुनियाद समझते रहोगे, यदि और जब सामाजिक व्यवस्था में अंकुश के लिये लाभ ही उद्देश्य रखोगे, तब तक असमानता न रहने का कोई कारण नहीं दिखता। समानता नाम मात्र की नहीं होनी चाहिए। इस देश में जब तक प्रत्येक व्यक्ति अथवा नागरिक के लिये आर्थिक समानता सुनिश्चित नहीं की जाती, तब तक राजनीतिक समानता, मताधिकार के उपयोग का कोई अर्थ नहीं रह जाता। हमने स्त्रीत्व को सम्मान दिये जाने के बारे में बहुत कुछ सुना है, मुझे भारतीय सभ्यता के सार रूप में और सामाजिक व्यवस्था के सार रूप में इस आशय की बात सुन कर बहुत प्रसन्नता हुई है। यदि यह बात ठीक है, और मैं उसमें संदेह नहीं कर रहा, तो उसको सम्पत्ति के मामले में दी जाने वाली समानता का विरोध क्यों नहीं किया जाना चाहिए? यदि आप स्त्रीत्व के इतने ही पुजारी हो, यदि आप स्त्रीत्व का इतना अधिक सम्मान करते हो, तो आप समान अधिकार देने में क्यों संकोच करते हो? आखिरकार यह सम्पत्ति रह जाने वाली वस्तु नहीं है और प्रत्येक व्यक्ति को उसे यहीं छोड़ जाना है। हम इसके साथ जितने अधिक चिपके रहे, इसको जितना अधिक बढ़ाते जाएं, मैं सम्मानपूर्वक और अत्यन्त विनम्र भाव से कहना चाहता हूँ कि मेरे विचार में विकास की प्रक्रिया में पुरुष की अपेक्षा महिला की भागीदारी में अधिक जीवंतता है। फिर भी इसमें किसी लिंग के तिरस्कार की बात नहीं है। मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि प्रकृति की ओर से महिला को जो कृत्य सौंपे गये हैं और सामाजिक व्यवस्था में स्त्रीत्व को जिन कार्यों से जूझना पड़ता है ओर जो उद्देश्य पूरे करने पड़ते हैं, हम उसका अधिक सम्मान नहीं कर पाते और इसलिये मैं उसके सम्बन्ध में किसी प्रकार की असमानता को उचित नहीं समझता। एक ही माता-पिता के पुत्र और पुत्री के बीच और पुरुष तथा महिला के बीच भेदभाव या द्वेषपूर्ण अन्तर नहीं किया जाना चाहिए।

दत्तकग्रहण अथवा अभिभावकत्व आदि के बारे में मुझे कोई इतनी रुचि नहीं है, जितनी कि इस सभा में कुछ माननीय सदस्यों ने प्रदशि्र्ात की है। दत्तकग्रहण अथवा वसीयत की शक्तियां मुझे मरणोपरांत मानव व्यक्तित्व का कृत्रिम विस्तार प्रतीत होती है। जब तक हम जीवित हैं, सम्पत्ति रखना और उस पर नियंत्रण बुरी बातें हैं और लाभ के उद्देश्य से सम्पत्ति रखना और भी बुरी बात है। हम अपने व्यक्तित्व को लम्बे समय तक क्यों बनाए रखना चाहते हैं, हम क्यों चाहते हैं कि मरने के बाद भी हमारे आदेश माने जाने चाहिए। दत्तकग्रहण जैसे साधन के द्वारा व्यक्ति के कृत्रिम विस्तार की क्या आवश्यकता है? यह जानते हुए भी कि यह एक प्राचीन व्यवस्था है, यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसको वे अपनी मुक्ति का साधन मानते हैं, मैं अभी यह कहने को तैयार नहीं कि इस व्यवस्था को तो तत्काल समाप्त कर दिया जाये। मैं कहना चाहता हूँ कि