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यदि आप इसको मुक्ति का साधन स्वीकार करते हैं, अपने व्यक्तित्व को शाश्वत् बनाना चाहते हैं, अपनी सभ्यता, संस्कृति और जीवन के कार्य को चिरकालीन बनाये रखना चाहते हैं, फिर तो ऐसा करना आवश्यक है। परन्तु उस स्थिति में आपको महिला और पुरुष के बीच कोई असमानता नहीं रखनी चाहिए। महिला और पुरुष के बीच कोई भेद-भाव या कानूनी पाबन्दी नहीं होनी चाहिए। समाज में सबको एक जैसा अधिकार मिलना चाहिए। मैं इस विधेयक का सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और राजनीतिक औचित्य के आधार पर समर्थन करता हूँ। मेरे विचार से हमने जिस संविधान को अंगीकृत किया है, योजनाबद्ध और प्रगतिशील समाज की स्थापना का जो आदर्श अपने सामने रखा है, जिन आशाओं को संजोया है, इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए, हमें इस विधेयक को सही दिशा में पहला कदम समझना चाहिए। हमारे लिये यही बेहतर होगा कि इस विधेयक में सम्मिलित उपबंधों को, जिनमें पुरुष और महिला के बीच असमानताओं को दूर करने का प्रावधान किया गया है, स्वीकार कर लें। प्रत्येक पांच वर्ष बाद या प्रत्येक तीन वर्ष बाद केवल मतदान कर देने से बात नहीं बनती। यह मामला जीवन के कार्यों से, जीवन के शिक्षा स्तर और स्वास्थ्य तथा रोटी, कपड़ा और मकान के बारे में मनुष्य की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति से सम्बन्धित है। ये सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिये और यदि वे नहीं है तो पूरे समाज के संयुक्त प्रयास के माध्यम से उपलब्ध करायी जानी चाहिए। समाज को अपने इस कर्तव्य को समझना चाहिए, इसको केवल कागजी कार्यवाही नहीं समझना चाहिए कि हमने संविधान में इसकी व्यवस्था कर दी है। बल्कि यह हमारा पवित्र कर्तव्य है कि हम कम से कम समय में इन सब वस्तुओं की व्यवस्था करें। इस देश के प्रत्येक नागरिक को यह सब कुछ उपलब्ध होना चाहिए, जिससे उनकी वे सभी आशाएं और आकांक्षाएं जिनको उसने इस देश की स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर संजोया है, पूरी हो सकें। एक महान् अमरीकी राष्ट्रपति लिंकन ने कहा कि कोई देश आधा गुलाम और आधा आजाद नहीं रह सकता। इस अर्थ में गुलाम न सही परन्तु इस देश अथवा समाज की आधी जनता अपने आपको अक्षम और कमजोर समझती है और उनमें भेदभाव किया जाता है, जिसे वे नहीं चाहते कि वह लम्बे समय तक चलता रहे। क्या इस सम्बन्ध में, मैं आंकड़ों पर आधारित कुछ तथ्य बता सकता हूँ, जिसे, शायद, इस सभा के सभी सदस्य ठीक से अनुभव नहीं करते? यह तथ्य इस प्रकार है। जबकि जन्म लेने पर महिलाओं की संख्या अधिक होती है परन्तु कुल मिला कर बाद की जनसंख्या में उनकी संख्या बहुत कम रह जाती है। उत्कल जैसे प्रान्त में जो भी स्थिति रही हो, पूरे भारत में महिलाओं की संख्या बहुत कम है। यदि विवाह योग्य आयु से आरम्भ करें, लगभग 15 वर्ष की आयु से, उनकी संख्या कम होती चली जाती है और इस प्रकार महिलाओं की कुल संख्या बहुत कम हो जाती है और वे अब भी अल्पसंख्या में हैं। इसकी क्या सार्थकता है?