(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 275

260 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

(इस समय उपाध्यक्ष महोदय अध्यक्षपीठ से उठे और श्री एस.वी. कृष्णामूर्ति राव (आयक्षीय तालिका के एक सदस्य) पीठ पर बैठे।)

इस बारे में मेरी निजी राय यह है कि महिलाओं के साथ, जैसे लड़के और लड़की या पुत्र और पुत्री के बीच असमान व्यवहार हो इसका कारण है। इसी लिये जन्म के समय बहुसंख्या में होते हुए भी बाद में वे अल्पसंख्या में रह जाती हैं। इसीलिए हमें असमान व्यवहार के आरोप का सामना करना पड­़ता है। इस विधेयक में इस असमानता को दूर करने का प्रयास किया गया है। प्रस्तुत विधेयक में अनेक उपबंध है और प्रत्येक व्यक्ति उनसे संतुष्ट नहीं हो सकता यहां तक कि वे भी जो उसको सिद्धांत रूप में उचित स्वीकार करते हैं। वे लोग भी जो यह मानते हैं कि इससे समाज का सुधार होगा, हमारे विधान में सरलता आएगी और हमारी सामाजिक प्रणाली का एक निश्चित सीमा तक सुविन्यास होगा। परन्तु हम अभी इस विषय पर विस्तृत चर्चा नहीं कर रहे हैं। किसी उपबंध विशेष की चर्चा न करते हुए, इस विधेयक की रचना का मूल सिद्धान्त, इस पूरी व्यवस्था का उद्देश्य सभा के समक्ष है, और मुझे विश्वास है कि इसको सभा स्वीकार करेगी।

श्री लक्ष्मीनारायण साहू (उड़ीसाः सामान्य)ः महोदय, मैं कहना चाहता हूँ कि मैंने यह बात मजाक में नहीं कही थी कि उत्कल में महिलाओं की संख्या अधिक है। उत्कल में महिलाओं की संख्या 3-4 लाख अधिक है और जब उनके विवाह के लिये कोई अच्छा वर नहीं मिलता, तब वे उनका विवाह सहादा वृक्ष के साथ कर दिया जाता है।

प्रो. के.टी. शाहः मैं पूरे देश की बात कर रहा हूँ, किसी प्रान्त विशेष की नहीं। इसलिये इस प्रश्न विशेष का उत्तर देना मैं आवश्यक नहीं समझता।

ऽसरदार हुक्म सिंह (पूर्वी पंजाबः सिक्ख)ः महोदय, इतनी लम्बी चर्चा के बाद मैं इस विषय पर कुछ नये तर्क प्रस्तुत करना आसान नहीं समझता, विशेषकर जब इस सम्बन्ध में सुप्रतिष्ठित वकील और सुप्रसिद्ध विद्वान इतने दिनों से अपने विचार व्यक्त करते रहे हैं। परन्तु जब मुझे एक समुदाय विशेष के प्रतिनिधि के रूप में जिस पर यह विधेयक लागू होता है, बुलाया गया है, तो मुझे उस समुदाय की भावनाओं को, जहां तक इस संहिता का सम्बन्ध है, सभा के समक्ष रखना ही चाहिए।

मैं अपने विद्वान मित्र प्रो. के.टी. शाह की इस बात से सहमत नहीं हूँ, कि वह एक भारतीय के रूप में बोलना चाहते हैं। मैं भी वही वाक्य बड़ी प्रसन्नता से दोहरा देता, यदि यह संहिता भारत के प्रत्येक नागरिक पर लागू होती। परन्तु यह जिस रूप में है,

ऽसी.ए. (विधि.) डी., खंड 6, भाग II, 14 दिसम्बर, 1949, पृष्ठ 607-10