(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 276

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यह केवल कुछ समुदायों पर ही लागू होती है। इसलिए मैं अपने समुदाय की ओर से ही इस पर बोलना अपना अधिकार और कर्तव्य समझता हूँ।

यद्यपि मेरे लिये एक अच्छी बात हुई है कि मुझे इतने विद्वानों के विचारों को सुनने का अवसर मिला है, परन्तु इसके साथ ही एक खराब बात यह है कि अधिकतर बातें कही जा चुकी हैं। और यदि मैं उनको दोहराता हूँ तो वे नीरस लगेंगी। इसलिये मैंने निर्णय किया है कि अपने आपको उन्हीं बातों तक सीमित रखूंगा, जो मेरे समुदाय से सम्बन्धित हैं और जिन पर मैं अपने विचार व्यक्त करना उचित समझता हूँ।

आरम्भ में, मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं यह नहीं चाहता कि समाज की प्रगति रुक जाये। मैं उन व्यक्तियों में से नहीं हूँ जो यह सोचते हैं कि सामाजिक कानून जैसे हैं, वैसे ही रहने चाहिए। मैं चाहता हूँ कि बदलते समय के साथ उनमें भी बदलाव आना चाहिए। मैं रूढि़वादी नहीं हूँ। मैं यह नहीं कहता कि हमें बदलते समय के साथ आगे बढ़ने का अधिकार नहीं है, न ही मैं यह समझता हूँ कि यह सभा अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होने के कारण या इस विधेयक के सम्बन्ध में जनता के विशेष समादेश के अभाव के कारण, अथवा किसी अन्य कारण से इस प्रकार का विधान बनाने के लिये सक्षम नहीं है। मैं समझता हूं कि यह सभा कोई भी कानून बनाने के लिये सक्षम है और इस प्रकार यह विधेयक पारित करने के लिये भी सक्षम है। इस सब के बावजूद मैं समझता हूँ कि मैं इस विधेयक का, जिस रूप में यह प्रस्तुत किया गया, पूरी तरह समर्थन नहीं कर सकता।

यदि राउ समिति द्वारा प्रस्ताविक मूल योजना का स्वीकार कर लिया जाता तो शायद, संहिता के कुछ भाग बिना किसी विरोध के पारित हो जाते। इस संहिता के कुछ पहलुओं पर मतैक्य होना चाहिए। परन्तु मैं अपने आपको कुछ मुद्दों तक ही सीमित रखूंगा। और इसलिये मैं इस विधान के सामान्य सिद्धान्तों के सभी पहलुओं पर अपने विचार व्यक्त नहीं करना चाहता।

प्रस्तावना में कहा गया है कि इस विधेयक का आशय हिंदू विधान जिस रूप में इस समय प्रवर्तन में है, की कुछ शाखाओं में संशोधन करने और संहिताबद्ध करने का है। परन्तु जब मैं इस विधेयक को पढ़ता हूँ, तो पाता हूँ कि हिंदू विधान की ऐसी कोई बात नहीं है, जिसे संहिताबद्ध करने का प्रस्ताव है। तलाक की बात ईसाई देशों से और उत्तराधिकार की बात मुसलमानी कानून से ली जा रही है। मुझे तो हिंदू विधान का संहिताकरण नाम ही गलत प्रतीत होता है।

डॉ. मनमोहन दास (पश्चिम बंगालः सामान्य)ः हमारे देश में ऐसी अनेक जातियां और जनजातियां हैं, जिनमें तलाक की प्रथा प्रचलित है। क्या वे हिंदू नहीं है? क्या माननीय सदस्य उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं?