(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 277

262 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सरदार हुक्म सिंहः यदि आप मुझे अनुमति देंगे, तो मैं इस विषय पर बाद में अपने विचार व्यक्त करूंगा। मुझे आशा है कि आप मेरी बात को धैर्यपूर्वक सुनेंगे।

जैसा कि मैंने कहा था, कि मैं अपने आपको अपने समुदाय से सम्बन्धित मुद्दों तक ही सीमित रखूंगा और अधिक विस्तार नहीं करूंगा। प्रस्तावना में कहा गया है कि विधेयक का आशय हिंदू विधान में संशोधन करने और उसे संहिताबद्ध करने का है और मैं दोबारा कहता हूँ कि इस संहिता में वह बात नहीं है। यदि जैसा कि प्रस्तावक ने आरम्भ में हमें बताया था कि 90 प्रतिशत लोगों के मामले में तलाक की व्यवस्था विद्यमान है, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है और वे जैसे है, वैसे ही रहें। आप उसे हिंदू विधान कह सकते हैं, परन्तु उसमें यह व्यवस्था नहीं है जिसे इस संहिता में लागू किया जा रहा है।

खंड 2 में उल्लिखित है कि यह विधेयक सिखों पर भी लागू होता है। हमें बहुत प्रसन्नता होती अथवा गर्व महसूस होता यदि कुछ अधिकार दिये जाने के मामले में भी हमें हिंदुओं में सम्मिलित किया जाता। परन्तु मैं यह देखता हूँ कि जहां एक ओर खंड 2 में हमें साथ मिलाया गया है, दूसरी ओर खंड 4 द्वारा हमारे, रीति-रिवाजों को गहरा धक्का पहुंचाया गया है। सभी रीति-रिवाजों, यहाँ खंड 3 में रीति-रिवाज की परिभाषा इस प्रकार की गयी है फ्जिसका निरन्तर और समरूप में पालन किया गया होय् और जो फ्निश्चित और लोक नीति के सम्बन्ध में अनुचित न हो और न ही उसके विरुद्ध।य् इस प्रकार आचरण के पवित्र नियम को कुचल देना, उसको सदा के लिये मिटा देना कहां तक उचित है? मुझे इस पर घोर आपत्ति है। मेरी आपत्ति विशेष रूप से इस बात पर आधारित है कि मेरा प्रान्त अर्थात् पंजाब ऐसा प्रान्त है जहां के रीति-रिवाज विधि का पहला नियम है। तलाक, शादी, उत्तराधिकार, वसीयत आदि जैसे सभी मामलों में पंजाब लॉ एक्ट में रीति-रिवाज का, प्रथम नियम के रूप में उल्लेख है। वे अपने रीति-रिवाजों का लम्बे अर्से से पालन करते आ रहे हैं और गांव में प्रत्येक व्यक्ति इस बात को समझता है कि उसे किस नियम का पालन करना है। इन रीति-रिवाजों पर न्यायिक निर्णयों की भी घोषणा की जाती है और सामान्य रूप से प्रत्येक ग्रामीण उनको समझता है, इसलिये मेरे विचार में इस परिवर्तन से साधारण किसानों के लिये मुश्किलें पैदा होंगी जो अपने कानून को लम्बे समय से भली-भांति समझते आ रहे हैं।

मेरी दूसरी आपत्ति विवाह के विषय में है। मैं यहां एक बात कह देना चाहता हूँ कि अब तक सिखों पर हिंदू विधान ही लागू होता रहा है और मेरी आपत्ति उसमें किये जा रहे परिवर्तन मे बारे में है। मुझे इसमें बिल्कुल कोई आपत्ति नहीं है यदि हिंदू विधान अपने पिछले रूप में लागू रहे। अब चूंकि ये परिवर्तन बाहर से थोपे जा रहे हैं, इसलिये सिखों को भी इस बारे में शिकायत है और वे महसूस करते हैं या रीति-रिवाज जैसे चल रहे हैं, उन्हें चलने दीजिए अथवा यह आवश्यक नहीं होना चाहिए कि वे पहिए के साथ-साथ घूमते रहें। मैं विवाह के सम्बन्ध में कुछ कहने जा रहा था। इसमें कोई