264 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ऐसी स्थिति है तो उसे चलने दीजिए। उसके ऊपर कुछ ऐसी शर्तें मत लगाइए जिनसे लोगों को उसके लिये अधिक खर्च करना पड़ जाए। एक साधारण व्यक्ति को इस तरह का परिवर्तन पहले से बेहतर होने के बजाय और बुरा लगेगा। यदि तलाक देने का वे अब कोई सरल तरीका अपनाते हैं और यदि भविष्य में उसको कोई पेचीदा तरीका अपनाने के लिये मजबूर किया जाता है, तो निश्चय ही वे उसका स्वागत नहीं करेंगे। यह तर्क दिया गया है कि पुरानी व्यवस्था में बुराइयां आने लगी हैं। विधेयक अनुज्ञापक है। अर्थात् किसी के लिये कोई बाध्यता नहीं है। परन्तु हमें इस बात को सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रस्तावित उपचार वर्तमान रोग से अधिक भयंकर न सिद्ध हो। इसमें कोई संदेह नहीं कि इसमें कुछ बुराइयां हैं। परन्तु यदि हम बन्धनों को ढीला कर देंगे तो जनसंख्या का बहुत कम प्रतिशत इस बन्धन से मुक्त होकर और अपने ही पैदा किए हुए दुःखों से छुटकारा पा कर प्रसन्न हो पायेगा। परन्तु अन्य अल्प- संख्यकों के बड़े जनसमूह का क्या होगा? क्या आप ऐसे लोगों के लिये एक जाल तैयार नहीं कर देंगे और वे लोग
खुलेआम बिना किसी भय के गलत रास्ते अपनाने लगेंगे। और अपना भविष्य आजमाने लगेंगे क्योंकि उनको छुटकारा पाने का तरीका नजर आने लगेगा?
इसके बाद मैं दूसरे मुख्य मुद्दे पर आता हूँ। यह दत्तकग्रहण के बारे में है। मेरे प्रांत अर्थात् पंजाब में, दत्तकग्रहण एक विशेष प्रथा है। इसको अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करने की प्रथा कहा जाता है। इसका धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह व्यावहारिक प्रयोजन के लिये एक सरल-सी घोषणा कर देना है, जिसमें भूमि का स्वामी किसी व्यक्ति का नामांकन कर देता है, कि वह उसके जीवनकाल में खेती के काम में उसका सहायक होगा और उसकी मृत्यु के बाद वह उसकी खेती का उत्तराधिकारी होगा। जैसे कि मैंने बताया, इस व्यवस्था का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है। इसमें आयु या सम्बन्ध का कोई
ख्याल नहीं रखा जाता। इस संहिता में आपने प्रस्ताव किया है कि वह पुत्री का पुत्र हो या बहन का पुत्र हो। परन्तु मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि पहले से प्रचलित प्रथा के अनुसार जो नियुक्ति की जाती है उसमें साधारण तौर पर उत्तराधिकारी के रूप में पुत्री के बेटे को ही नियुक्त किया जाता है। साथ ही बहन के बेटे को भी नियुक्त किया जाता है। इस सम्बन्ध में कोई रोक बिल्कुल नहीं है। कोई युवक अपने पिता की आयु के व्यक्ति का भी दत्तकग्रहण कर सकता है। किसी ऐसे व्यक्ति को भी उत्तराधिकारी नियुक्त किया जा सकता है, जिसके अनेक पुत्र हों। यहां बैठे कुछ व्यक्तियों को यह बात विचित्र लगती होगी परन्तु यह सच्चाई है। एक विवाहित व्यक्ति, बच्चों वाले व्यक्ति को भी उत्तराधिकारी नियुक्त किया जा सकता है। इस प्रथा में धर्म का कोई लेना-देना नहीं है। इस प्रथा को कायम रखने के लिये आप क्या कर रहे हैं? क्या आप इसको समाप्त कर रहे हैं? निश्चय ही यह व्यवस्था युगों से चली आ रही है और यह मान्यता प्राप्त है। यह प्रथा देश के हमारे भाग में इतनी लोकप्रिय है कि उसको इतनी आसानी से समाप्त नहीं किया जा सकता। लोग इस बात को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे