(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 282

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श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः महोय, अभिप्राय यह है कि अधिक से अधिक वक्ताओं को बोलने का अवसर मिल सके। यह तो हैरानी की बात है कि लोग अपने विचार व्यक्त नहीं करना चाहते। मेरा सुझाव है कि जब तक लोग बोलने को तैयार हों, हम बैठे रहें। हम यहां सुनने के लिये बैठेते हैं और जब कोरम नहीं होगा, हम स्वतः ही बन्द कर देंगे।

श्रीमती पूर्णिमा बनर्जी (यू.पी.ः सामान्य)ः माननीय सदस्यों का कहना है कि हिंदू संहिता जैसे महत्वपूर्ण विषय पर अनेक सदस्य अपने विचार व्यक्त करना चाहते हैं। जब, हम में से अधिकांश सदस्य बोलना चाहते हैं और उनको समय दिया जा सकता है तो 7 बजे तक बैठने में क्या आपत्ति है?

माननीय उपाध्यक्षः मैं इससे पूरी तरह सहमत हूँ। यदि अधिकांश सदस्य बैठना चाहते हैं और बोलना चाहते हैं तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है।

कुछ माननीय सदस्यः जी, हां, हम इससे सहमत हैं।

माननीय अध्यक्षः ठीक है, श्री मुनिस्वामी पिल्ले समाप्त कर लें, फिर देखेंगे।

ऽश्री वी.आई. मुनिस्वामी पिल्लेः मेरा सम्बन्ध ऐसे समुदाय से है जो शताब्दियों तक हिंदू समाज से बहिष्कृत रहा है। मैं इस सामाजिक और धार्मिक सुधार करने वाली व्यवस्था का स्वागत करता हूँ। हम जो भारत की जनसंख्या का छठा भाग हैं। महात्मा गांधी के आगमन का स्वागत करते हैं, जिन्होंने हिंदू समाज में क्रान्तिकारी परिवर्तन किये, ताकि सवर्ण हिंदुओं को ही नहीं, बल्कि हिंदू समाज के अन्य वर्गों को भी बराबरी का दर्जा मिल सके। मुझसे पहले बोलने वाले कुछ सदस्यों ने कहा है कि धर्म खतरे में है। मुझे समझ में नहीं आया कि उनके दिमाग में ऐसे विचार कहां से और कैसे उत्पन्न हुए? इस देश को अपने अनेक अवतारों पर गर्व हैµभगवान बुद्ध, शंकर, रामानुज समाज सुधारक जैसे राजा राम मोहन राय और वर्तमान शताब्दी में महात्मा गांधी जैसे महापुरुष हुए, जिन्होंने पाया कि अस्पृश्यता हमारे राष्ट्र के अस्तित्व के लिये घातक है और स्वयं अन्तरजातीय विवाह का मार्ग प्रशस्त किया। इन सभी सुधारों से पता चलता है कि हम भी युग परिवर्तन के साथ-साथ प्रगति कर रहे हैं। जब कभी विधानमंडल के समक्ष सामाजिक सुधार का मामला रखा गया है, रुकावटें पैदा की गयी हैं, ताकि सुधार क्रियान्वित न होने पाये। मेरा सम्बन्ध मद्रास क्षेत्र से है, मैं सभा को बताना चाहता हूँ कि जब मद्रास विधानमंडल में ‘मन्दिर प्रवेश’ पर विचार किया जा रहा था तो हमें किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था। यहां तक कि असपृश्यों की सामाजिक अक्षमताओं को दूर करने के मामले में भी जनता को समझाने के लिए जो मंत्रीगण उनके बीच गये तो उनके मुँह

ऽसी.ए. (विधि) डी., खंड 6, भाग II, 14 दिसम्बर, 1949, पृष्ठ 611-614