(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 283

268 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पर पिसी हुई लाल मिर्चें फैंकी गयी। इस देश में जब सामाजिक सुधार किये जाते हैं, तो ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। जब महान शंकर हमारे देश में अद्वैतवाद लाये और जब उनके गुरु ने उनसे पूछा फ्आप कौन हो?य् उन्होंने उत्तर दियाः

न मैं मृत्युडा न मैं जाति भेदः।

पिता नैव मे व माता न जन्मः।।

न बंधुर्न मित्रों न गुरुर्न शिष्यः।

चिनादरूपः शिवोडंह शिवोडहः।।

शंकर महान ने यही शब्द बोले थे। उन्होंने मनुष्य, मनुष्य में अथवा महिला, महिला में भेद नहीं किया। उनके विचार में सब लोग एक समान हैं। इस विधेयक का विरोध किये जाने का मैं कोई कारण नहीं समझता। दक्षिण में एक महान् दार्शनिक तिरुवल्लुवर हुए हैं, उन्होंने विश्व को बताया है कि पुरुष और महिला को किस प्रकार रहना चाहिए_ उनको किन परिस्थितियों में रहना चाहिए। महिलाएं मोती के समान बहुमूल्य हैं, अतः उनकी सभी प्रकार की सुविधाओं में, जो भगवान ने मानवमात्र को दी हैं, मैं बराबर का हिस्सा दिये जाने पर आपत्ति करने का मैं कोई कारण नहीं समझता।

मुझ से पहले बोलने वाले कुछ सदस्यों ने कहा कि अभी समय ठीक नहीं है। 20 जनवरी, 1944 को जब संविधान सभा का संकल्प पारित हुआ था, तब से यह व्यवस्था देश के विचाराधीन है। हिंदू संहिता पर देश के कोने-कोने में चर्चा होती रही है। शिक्षित वर्ग ही नहीं अपितु आम जनता ने भी इस विधान की विषय-वस्तु को समझ लिया है। मैं नहीं समझता कि जो सदस्य इस सभा को विधेयक को निपटाने के मामले में सक्षम नहीं समझते, वे देश के प्रति अपने दायित्व ठीक से निभा रहे हैं। इस सभा के सदस्य जिनको 30 करोड़ जनता के लिये संविधान तैयार करने का गर्व प्राप्त हुआ है, जिसका भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी स्वागत हुआ है, क्या वे इस देश की महिलाओं के उत्थान हेतु इस विधेयक को निपटाने के लिये सक्षम नहीं हैं। हमने संविधान के मूल अधिकारों में स्पष्ट रूप से लिखा है कि सरकार फ्धर्म, जाति, लिंगय् के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगी। अनुच्छेद 15(3) में फिर कहा है कि फ्इस अनुच्छेद का कोई भी उपबंध महिलाओं और बच्चों के लिये विशेष प्रावधान करने में बाधक नहीं होगा। पुनः अनुच्छेद 46 में फिर कहा गया हैµफ्राज्य जनता के कमजोर वर्गों के शैक्षणिक और आर्थिक हितों पर विशेष ध्यान देगी...य् क्या महिलाएं इस वर्ग में नहीं आतीं और क्या उनका संरक्षण नहीं होना चाहिए? फिर यह विधान तो अनुज्ञात्मक है, और सभी को इसका स्वागत करना चाहिए।

यदि सभी प्रान्तों में हिंदुओं के विवाह, उत्तराधिकार, दत्तकग्रहण और इन्हीं सब बातों के नियमों का अध्ययन करेंगे तो पता चलेगा कि वे एक समान नहीं हैं। अनेक स्थानों