269
पर वे भिन्न-भिन्न हैं। संविधान में लिखा है कि हमें एक समान सिविल संहिता बनानी चाहिए। मेरे राय में यह विधेयक उस दिशा में पथ प्रदर्शक का काम करेगा। मेरा सम्बन्ध उस जिले से है, जहां अनेक पहाड़ी जनजातियां हैं। यद्यपि वे अपने आपको हिंदू कहती हैं, तथापि उनके विवाह सम्बन्धी रीति-रिवाज, उत्तराधिकार के नियम आदि हिंदुओं से बहुत भिन्न हैं। प्राकृतिक ‘टोडा’ आदिवासी समुदाय में बहुविवाह की प्रथा प्रचलित है और इस समुदाय की इस सामाजिक बुराई के कारण उनकी जनसंख्या घटती जा रही है। एक अन्य आदिवासी समुदाय ‘वाडागास’ के रीति-रिवाज भी हिंदुओं से काफी भिन्न हैं, यद्यपि वे अपने-आप को हिंदू कहते हैं। उनमें यह रिवाज है कि जब कोई व्यक्ति किसी लड़की से विवाह करना चाहता है तो वह उसको दहेज देता हैµजिसको वे थिरायपनम कहते हैं। तत्पश्चात् यदि वह महिला अपने पति का परित्याग करना चाहती है, और यदि कोई अन्य व्यक्ति उतना ही दहेज अर्थात् थिरायपनम देता है, तो वह महिला दूसरा व्यक्ति चुनने के लिए स्वतंत्र है।
इस देश में जिसमें इतने महान ऋषि व संत हुए हैं। क्या वे सब बातें होती रहनी चाहिए। इस नये संविधान के अधीन, सभी की, चाहे वे जनजातियां ही हों अथवा पहाड़ी जनजातियां हों, रक्षा की जायेगी।
महोदय, मद्रास प्रान्त में, जैसा कि मेरे कुछ मित्रों ने पहले बताया है बहुविवाह की प्रथा सांविधिक रूप से समाप्त कर दी गयी है। अब जब तक समूचे देश के लिये किसी विधि को संहिताबद्ध न किया जाये, तब तक कोई व्यक्ति मद्रास से अन्यत्र जाकर और विवाह करके मद्रास में रहने के लिये वापस आ सकता है। जब तक कोई ऐसा कानून न बन जाये, जो सभी प्रान्तों में समान रूप से लागू हों, मद्रास में अलग से इस कानून को लागू करना सम्भव नहीं है।
इस सभा में प्रस्तुत हिंदू संहिता विधेयक के अन्य मुख्य मुद्दे विवाह और विवाह-विच्छेद से सम्बंधित अध्याय हैं। यह पहले बताया जा चुका है, सांस्कारिक विवाह और सिविल विवाह, दोनों प्रकार के विवाह चलते रहने चाहिए। इसके अनुसार, अनुसूचित जातियां पाती है कि ‘योगम’ होना चाहिए। और तभी सच्चे मायनों में विवाह माना जाता है। अब सिविल विवाह अधिनियम लागू होने के बाद भी सभी लोग इस प्रथा को निभाते हैं। मुझे इस बात का कोई कारण नजर नहीं आता कि अब सभी हिंदू, रूढि़वादी और अन्य, इसी विधि को क्यों नहीं अपना लेते।
खंड 33 (एफ) में ‘परगमन’ का उल्लेख है। मैं चाहता हूँ क ‘परगमन’ शब्द का प्रयोग इस संहिता में बिल्कुल न किया जाये क्योंकि जैसा कि स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि जब हम हमारे देश में तीन महिलाएं हैं, तब तक भारत की पवित्रता बनी रहेगी। महोदय, मेरे विचार से हिंदू समाज में किसी भी वर्ग में बड़े पैमाने पर ‘परगमन’ नहीं