(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 285

270 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

होता निःसंदेह कहीं कुछ विरले मामले हो सकते हैं। परन्तु मेरे विचार में उसके लिये किसी सांविधिक उपबंध की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

खंड 9 के उपखंड 2 और खंड 16 में कानून का उल्लंघन करने वाले लोगों को दंड देने की व्यवस्था है। उसमें विहित धनराशि बहत अधिक है, विशेष रूप से समाज के निर्धन वर्ग के लिये। मेरे विचार में यह राशि नाम मात्र होनी चाहिए। न्यायालीय सम्बन्ध-विच्छेद के मामले में, धनवान लोगों के मामले में, जो सम्बन्ध-विच्छेद के लिये न्यायालयों में जा सकते हैं यह ठीक है। परन्तु ग्रामीणों का क्या होगा, जिनकी संख्या भारत में बहुत अधिक है, जहां सामुदायिक पंचायतें हैं और जिनमें कुछ लोगों द्वारा निर्वाचित सदस्य होते हैं और वे ही ऐसे मामलों को निपटाते हैं। अतः मेरे विचार में यह प्रक्रिया ठीक नहीं है। कोई ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए, जिससे पंचायतों में लोगों के चुने हुए प्रतिनिधि हों और वे ही विवाह-विच्छेद के मामलों का निपटारा करें।

अब मैं स्त्रीधन का उल्लेख करना चाहता हूँ। पिता व भाई जो कुछ लड़की को देते हैं, वही स्त्रीधन कहलाता है। यदि लड़की का पति उसका उचित उपयोग नहीं करता, तो उसका क्या होगा। महोदय, मेरे विचार में, इसमें कोई ऐसा खंड जोड़ा जाना चाहिए, जिससे स्त्रीजन सदा के लिये उस महिला की सम्पत्ति बनी रहे।

खंड 72 में दत्तकग्रहण का उल्लेख है, उसमें लिखा है कि दत्तकग्रहण करने वाले पिता या माता वैध तरीके से किये गये दत्तकग्रहण को रद्द नहीं कर सकते और न ही दत्तक ग्रहण किया गया बेटा अपनी परिस्थिति का परित्याग कर सकता है और अपने जन्मदाता परिवार में जा सकता है। महोदय, मेरे विचार में, यदि वह बेटा या दत्तकग्रहण किया गया कोई व्यक्ति दुर्व्यवहार करता है अथवा परिवार के धन को नष्ट-भ्रष्ट करता है तो उस स्थिति को रोकने के लिये कोई व्यवस्था की जानी चाहिए।

धारा 93 पत्नी के लिये धरोहर के रूप में रखे जाने वाले दहेज से सम्बन्धित है औ उसमें लिखा है कि इस संहिता के प्रवर्तन के बाद यह धारा लागू होगी। मैं महसूस करता हूँ, महोदय, यह इस संहिता के प्रवर्तन के पूर्व के प्रत्येक मामलों में भी लागू हो। जो इस संहिता के प्रवर्तन से पहले के हैं।

महोदय, अन्त में मैं यही कहना चाहता हूँ कि पुरुषों की सख्ती की शिकार सभी महिलाओं को हिंदू संहिता विधेयक लागू होने से बहुत राहत मिलेगी। अनेक लोग कहते हैं कि महिलाओं को बराबर के विशेषाधिकार और सुविधाएं प्राप्त हैं। परन्तु वास्तव में ऐसी स्थिति नहीं है। कुछ मामलों में ऐसी बात हो सकती है। परन्तु 90 प्रतिशत महिलाओं को अब भी अनेक सामाजिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। चार युगों, सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलि के बाद अब हम ‘लौह युग’ में हैं और सुधार लाने में सक्षम हैं। हमें इस बात को सुनिश्चित करना चाहिए कि महिलाओं को वे सभी