(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 287

272 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लागू करेगी? मैं यह बात सरकार को परेशान करने के लिये नहीं कह रहा। मैं इस बात को दोहराना चाहता हूँ। जब इसे ऐसे प्रस्तुत किया गया है, तब आपको इस समस्या को समुचित ढंग से प्रस्तुत करना होगा। आपको पता है कि भारत में एक समुदाय है, जो धर्म के आधार पर आपत्ति करेगा और आपको स्मरण होगा कि इस देश के विभाजन के बाद कैसी अवांछनीय घटनाएं हुई थीं। आपको कहा जा रहा है कि ऐसा करना धर्म में हस्तक्षेप है कि यह बात राज्य के धर्मनिपेक्ष स्वरूप के विरुद्ध होगी। अब प्रधानमंत्री ने इस आशय की घोषणा कर दी है कि हमारा देश धर्मनिरपेक्ष रहेगा। हमको देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के बारे में जनता को शिक्षित करना चाहिए। सीमा के दूसरी ओर बहुत कुछ हो रहा है और उसकी प्रतिक्रिया इस ओर भी हो सकती है। वह देश मजहवी राज्य बन चुका है और वे निहितार्थ नीति पर पूरी तरह चलने के लिये प्रस्तावित है और यह सम्भव नहीं है कि उस तरह की नीति की इस ओर कोई प्रतिक्रिया न हो। इसलिये जनता हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के बारे में भी शंकाएं कर सकती है। वे इस बात को इस रूप में लेते हैं और इसका निश्चित कारण भी है कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह है कि हिंदू धर्म में हर प्रकार के फेरबदल किये जा सकते हैं और दूसरे समूह के मामले में सरकार संकोच करती रहेगी। इस देश की आम जनता की इस प्रकार के उपायों के बारे में इस तरह की प्रतिक्रिया होगी। अतः इस देश में हम जो धर्मनिरपेक्ष राज्य स्थापित करना चाहते हैं, उसके लिये हमें जनता को अपने विश्वास में लेकर आगे बढ़ने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि केवल सरकार कहती रहे कि वह धर्मनिरपेक्ष राज्य है और देश में जनता न उसको ठीक ढंग से समझे और न ही सराहना करे, तो उस दावे का कोई अर्थ नहीं रह जाता और राज्य धर्मनिरपेक्ष भी नहीं बना रह सकता। हम उस आदर्श को खो देंगे, जिसे हम इस देश में पाना चाहते हैं और हमें अपने लक्ष्य प्राप्ति की तारीख आगे बढ़ानी पड़ेगी। महोदय, इसीलिये मैं कहता हूँ कि इस समय जनता मानसिक रूप से इस परिवर्तन के लिये तैयार नहीं है। वह अभी उदास हैं। वह चिढ़े हुए हैं। जिस प्रकार जब कोई बालक नाराज होता है तो वह मीठी वस्तु भी खाने से मना कर देता है। लोग इस सुधार को भी अच्छा मानने को तैयार नहीं है, हालांकि इस विधेयक में कुछ अच्छी बातें हो सकती हैं। अतः अच्छी बात यह होगी कि यदि जनता अभी इसको स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं, तो उसके साथ जबरदस्ती न की जाये। पिछली बार डॉ. अम्बेडकर ने बुर्के को उद्धृत किया था। उन्होंने हमारे समक्ष एक धुंधली तस्वीर खींची थी और हमें चेतावनी दी थी जैसी कि उन्होंने संविधान के तीसरे वाचन में अपने भाषण के अन्त में कहा था। उन्होंने कहा थाःµ

फ्जो व्यक्ति किसी वस्तु को बनाये रखना चाहता है, उसको उसकी मरम्मत के लिये तैयार रहना चाहिए।य्

महोदय, यह बहुत बड़ी बात है, हमें मरम्मत के लिये तैयार रहना चाहिए। परन्तु क्या इस विधेयक का प्रयोजन केवल मरम्मत तक सीमित है। मेरे विचार में इस व्यवस्था