(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 293

278 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

गया, विवाह-विच्छेद के उपबंध की भी मांग होने लगी। इस देश में जब तक महिलाएं एकपत्नीक व्यवस्था के अन्तर्गत थीं, विवाह-विच्छेद की कोई व्यवस्था नहीं थी, परन्तु अब वे कहते हैं कि विवाह-विच्छेद एकपत्नीक व्यवस्था का सहज परिणाम है। इस सम्बन्ध में मेरी बहनें इतनी अधिक उत्सुक क्यों हैं? इसका अर्थ क्या है? यदि एक पत्नीक व्यवस्था का विवाह-विच्छेद सहज परिणाम है तो इसका अस्तित्व अब तक सामने क्यों नहीं आया?

माननीय उपाध्यक्षः माननीय सदस्य और कितने समय तक बोलेंगे?

श्री ओ.वी. अलगेसनः केवल 10 मिनट और। परन्तु इससे पहले भी समाप्त करने का प्रयास करूंगा। अतः मेरा कहना यह है कि विवाह-विच्छेद का अधिकार दिया जाना कोई अच्छी बात नहीं है। मैं उद्धरण पढ़ना नहीं चाहता, परन्तु अनेक महिलाओं ने अपना मत व्यक्त किया है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को विवाह-विच्छेद व्यवस्था से कहीं अधिक मुसीबतें झेलनी पड़ेंगी।

श्री ए. थानु पिल्लेः क्या माननीय सदस्य विवाह-विच्छेद की व्यवस्था के बिना एकपत्नीक व्यवस्था के पक्ष में हैं?

श्री ओ.वी. अलगेसनः मैं एक पत्नीक व्यवस्था चाहता हूँ और उसमें विवाह-विच्छेद का स्थान नहीं होना चाहिए।

महोदय, यह विधेयक एक हाथ से जो कुछ देता है वह दूसरे हाथ से छीन लेता है।

डॉ. अम्बेडकर ने विवाह-विच्छेद के उपबंध को उचित ठहराते हुए उन महिलाओं की अनेक कठिनाइयों का उल्लेख किया है जिनको वर्तमान में पति छोड़ देते हैं। तलाक पाने वाली महिलाओं का भविष्य भी उतना ही खराब है, जितना उन महिलाओं को, जिनको पतियों ने छोड़ दिया है? तलाक पाने वाले पुरुष के लिये पुनः विवाह कर लेना सरल है, परन्तु तलाक पाने वाली महिला के लिये इतना सरल नहीं है।

डॉ. पी. सुब्बरायण (मद्रासः सामान्य)ः तो आप दोहरे मापदंड अपनाना चाहते हैं।

श्री ओ.वी. अलगेसनः मैं चाहता हूँ कि मेरी बहनें इस ओर ध्यान दें और उस गड्डे के प्रति सचेत रहें, जहां यह विधेयक उनको ले जाना चाहता है।

विवाह-विच्छेद के उपखंड पर मुझे घोर आपत्ति है और इसके अनेक अन्य कारण भी हैं। दूसरे देशों का क्या अनुभव है? कुछ अन्य वक्ताओं ने भी इस विषय पर अपने विचार व्यक्त किये हैं और मैं इस पर विस्तार से बात नहीं करना चाहता। हाल में हमें बताया गया था कि केवल पैरिस में ही विवाह-विच्छेद के मामलों की संख्या 600 से बढ़कर 1200 हो गयी है, जो केवल 100 प्रतिशत वृद्धि है।

एक माननीय सदस्यः भारत में कोई पैरिस नहीं है।