(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 294

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श्री ओ.वी. अलगेसनः मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि वर्तमान में भारत में कोई पैरिस नहीं है, परन्तु मुझे इस बात की आशंका है कि इस विधेयक के लागू हो जाने पर भारत में भी पैरिस जैसी स्थिति बन जायेगी।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः यहां बड़ौदा है, मालावार है।

श्री ओ.वी. अलगेसनः विश्व में अत्यन्त समुन्नत देशों में से एक सोवियत रूस में संस्था के रूप में परिवार टूटता जा रहा है। वहां पहले तलाक की प्रक्रिया सरल बना दी गयी थी। अब परिवार को संस्था के रूप में पुनर्जीवित करने के लिये सोवियत रूस कड़ी मेहनत कर रहा है। अब वह संस्था के रूप में परिवार की पवित्रता पर जोर देते हैं और सब को शिक्षित करना चाहते हैं और अपने नागरिकों में साम्यवादी नैतिकता भर देना चाहते हैं। वे इस संस्था को बचाने के लिये अथक प्रयत्न कर रहे हैं जिसको उन्होंने देश में तलाक व्यवस्था लागू करके खो दिया था। वहां पर रजिस्ट्रार को मात्र एक पोस्ट कार्ड लिखना होता था कि वह अपनी पत्नी को तलाक देता है और उसे तलाक मिल जाता था। मैं समझता हूँ कि अब तलाक सम्बन्धी अपने नियमों को उन्होंने बहुत कठोर बना दिया है। हमारे सामने यह एक उदाहरण है।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः मालावार में क्या विचार है? रूस और पैरिस जाने की क्यों आवश्यकता हुई?

श्री ओ.वी. अलगेसनः वहां उन्होंने यह प्रयोग करके देख लिया है और उनको पता चल गया है कि यह उपाय हानिकारक है। अतः उस बुराई को अपनाकर और फिर उसे दूर करने के लिये प्रयास करने की क्या आवश्यकता है। भारत में हमारे गरीब भाई रहते हैं, वे अबोध हैं, अस्वस्थ हैं परन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि हमारे परिवार बिखरे हुए हैं। दूसरे देश में वे धनवान और स्वस्थ हो सकते हैं और प्रबद्ध भी हो सकते हैं, परन्तु यह देखकर दुख होता है कि उन देशों में अनेक परिवार बिखरे पड़े हैं और इस स्थिति का एकमात्र कारण तलाक देने का लाइसेंस दिया जाना है। मेरी यही राय है।

डॉ. टेक चन्द जैसे सुप्रसिद्ध व्यक्ति की भी यही राय है कि संयुक्त हिंदू परिवार व्यवस्था बनी रहनी चाहिए और पत्नी को सहसमांशी बना देना चाहिए। मैं कहना चाहूंगा कि महिलाओं की वास्तविकता आर्थिक स्वाधीनता, पुत्री को हिस्सा देने से नहीं, जिस पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि पति की सम्पत्ति में हिस्सा देने से प्राप्त होगी। इसी तरीके से वह आर्थिक रूप से स्वाधीन होगी, पिता की सम्पत्ति से हिस्सा लेने से ऐसा नहीं होगा। आखिरकार पुत्री न्यास की तरह है जो दामाद को सौंपा जाता है। पिता, पुत्री को न्यास की तरह रखता है और इसलिये यह बेहतर और उचित होगा कि उसको पिता की सम्पत्ति में हिस्से का दावेदार बनाने के बजाय, पति की सम्पत्ति में संयुक्त मालिक अथवा बराबर का हिस्सेदार बनाया जाये। यदि वह अविवाहित रहे तो पिता की सम्पत्ति में हिस्सा ले सकती है।