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ऽहिंदू संहिताµजारी
माननीय उपाध्यक्षः प्रस्ताव, जिस पर सभा विचार कर रही थीःµ
फ्कि हिंदू विधान की कुछ शाखाओं में संशोधन और उनको संहिताबद्ध करने वाले विधेयक, जो प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में है, पर विचार किया जाये।य्
ऽमाननीय श्री जवाहर लाल नेहरू (प्रधानमंत्री)ः महोदय, मैं हिंदू संहिता विधेयक के सम्बन्ध में एक वक्तव्य देने के लिये आपकी अनुमति और सभा की कृपा चाहता हूँ, और मुझे विश्वास है कि मैं जो वक्तव्य दूंगा, सभा उसका अनुमोदन करेगी।
इस सब के आरम्भ में, मैंने हिंदू संहिता विधेयक पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि सरकार इस विधेयक को बहुत अधिक महत्व देती है और उनको आशा है कि इस सत्र के दौरान इस पर विचार का कार्य पूरा हो जायेगा। इसके साथ ही सरकार को इस बात की भी जानकारी थी कि इस विषय पर लोगों की अलग-अलग राय होगी और विधेयक के उपबंधों में अनेक लोगों की रुचि होगी। इसलिये मैंने उस समय सुझाव दिया था कि हमारा विचार एक ऐसा रास्ता अपनाने का है जिससे हमें आशा है विधेयक में अनेक विवादास्पद
खंडों के बारे में मोटे तौर पर कोई समझौता हो जायेगा। इस विषय के बारे में सरकार की नीति को स्पष्ट करने के लिये मैं अपने इस वक्तव्य को विस्तृत रूप से रखना चाहता हूँ। हमने इस विषय पर काफी लम्बी बहस कर ली है। इस सत्र में ही नहीं बल्कि पिछले सत्रों में भी। इस अवसर पर हमने दो दिन अलग से रखे थे और सभा को जानकारी है कि उन दिनों में दो अवसरों पर देर तक बैठ कर बहस को जारी रखा गया। इस प्रकार के महत्वपूर्ण विधेयक पर वाद-विवाद को सीमित करने की सरकार की कोई इच्छा नहीं है। इसके बावजूद कि समय की बहुत तंगी थी और सत्र के दौरान अनेक विधायी मदों को निपटाया जाना था, हमने दो अवसरों पर चर्चा को अधिक समय तक जारी रखा और निश्चय ही आज का दिन भी इसी प्रयोजन के लिये निर्धारित किया गया।
यद्यपि इस वाद-विवाद को सीमित करने की हमारी कोई इच्छा नहीं है, सरकार को प्रतिदिन समय बढ़ाने में दिक्कत का सामना करना पड़ता है। फिर भी हम अधिक समय देने के लिये तैयार हैं, क्योंकि सभा के कुछ सदस्यों की ऐसी ही इच्छा है और यह विधेयक भी महत्वपूर्ण है। परन्तु इस मामले का एक और भी पहलू है और वह यह है कि क्या हम विवादस्पद खंडों के बारे में यथा सम्भव किसी सहमति का रास्ता निकालने के लिये कोशिश की भावना से विचार करने वाले हैं, यदि जैसा कि मैंने कहा, हम उसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं जिनका संकेत मैंने आरम्भ में दिया था, तब तो इस चर्चा को जारी रखना वांछनीय है और यदि हम एक ऐसा वातावरण तैयार करते हैं अथवा वातावरण तैयार करने
ऽसी.ए. (विधि) डी., खंड 7, भाग II, 19 दिसम्बर, 1949, पृष्ठ 783-85