282 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
में सहायक हैं। जिससे उस तरह का समाधान आसानी से हो जाए, सरकार के मत में यह एक महत्वपूर्ण बात थी। मैंने आरंभ में ही सभा में निवेदन किया था कि हमारे मन में यह विचार है। सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं था कि बहुमत के आधार पर इस दिशा में आगे बढ़ा जाये और इस विधेयक के प्रत्येक खंड को पारित करवा लिया जाये, यद्यपि इस बारे में काफी लोगों की राय भिन्न-भिन्न हो सकती है। जहां तक इस विधेयक का सम्बन्ध है, सरकार का दृष्टिकोण यही है। हम इस विधेयक के प्रति व्यापक रुख अपनाने के लिए वचनबद्ध है। यद्यपि हम सब लोगों के दृष्टिकोण को समझ कर प्रत्येक खंड पर विचार करने को तैयार हैं। सरकार ने इस विधेयक को सभा के समक्ष प्रस्तुत किया है, क्योंकि उसको इसी में विश्वास है, परन्तु हम चाहते हैं कि ऐसे मामलों में हमें अधिक से अधिक समर्थन मिले। अब उसमें और इस आम चर्चा में, जो अब चल रही है, अन्तर है और हम सोचते हैं कि इस विषय पर विस्तृत चर्चा हो चुकी है और इस वाद-विवाद में बड़ी संख्या में सभा के सदस्यों ने भाग लिया है। हम चाहते हैं कि अब इस चर्चा को समाप्त कर दिया जाये ताकि यथाशीघ्र दूसरे चरण की चर्चा आरम्भ की जा सके अर्थात् अनौपचारिक चर्चा। पर जब तक चर्चा का यह चरण समाप्त नहीं होगा, तब तक वह चर्चा प्रभावी ढंग से नहीं की जा सकती। अन्यथा गतिरोध पैदा हो जायेगा और हम आगामी चरण की ओर बढ़ नहीं सकते। इसलिए अब हमारा प्रस्ताव यह है और मैं इसको सभा के समक्ष रखने का साहस करता हूँ कि इस विचारार्थ प्रस्ताव पर चर्चा को यथाशीघ्र समाप्त कर दिया जाये। मुझे इस पर आपत्ति नहीं है कि सरकार अन्य विधायी कार्य की उपेक्षा करके भी इस विधेयक के लिये अधिक समय दे, परन्तु मैं सभा से यह कहना चाहता हूँ कि यदि सभा को अनौपचारिक चर्चा का यह सामान्य प्रस्ताव स्वीकार्य है, तो अगले चरण पर जाना वांछनीय है और विद्यमान चरण पर वाद-विवाद में तीक्षणता कर वातावरण खराब करना उचित नहीं है।
जब मैं अनौपचारिक विचार-विमर्श की बात करता हूँ तब स्पष्ट कर देना चाहिए कि इसके क्या मायने हैं। मैंने अनौपचारिक कहा है, इसका यह अर्थ नहीं कि मैं इसको कोई महत्व नहीं देता, बल्कि मैं उस चर्चा में थोड़ा लचीलापन लाना चाहता हूँ जिससे मेरे माननीय सहयोगी विधि मंत्री, जिन्होंने इस विधेयक की जिम्मेदारी अपने कंधों के ऊपर ली है और मुझे विश्वास है कि वह उन प्रस्तावों को, जिन्हें मैंने प्रस्तुत किया है, प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करेंगे और कार्यरूप देंगे ताकि न केवल वे प्रवर समिति के सदस्यों से ही नहीं बल्कि इस सदन के अन्य सदस्यों से, जिन्होंने इस विषय में रुचि ली है, और इस सभा से बाहर भी लोगों के साथ परामर्श कर सकेंगे। यदि हम कोई कठोर प्रक्रिया अपनाएँ तो अब ऐसा करना कठिन होगा और जब आप औपचारिक तथा कठोर प्रक्रिया अपनाते हैं तो निष्पक्ष और सरल चर्चा करना मुश्किल हो जाता है और यदि प्रक्रिया अधिक लचीली और अनौपचारिक हो, तो विचारों के आदान-प्रदान में आसानी होती है। इसलिये मैं यह प्रस्ताव सभा के समक्ष रखता हूँ और निवेदन करता हूँ इस विषय में, अब तक की गयी सभी चर्चा और वाद-विवाद पर विचार करने के बाद यह वाजिब प्रस्ताव रखा गया है जिसे सभा के सभी पक्षों से स्वीकृति