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मिलनी चाहिए, क्योंकि यह सरकार का इस सभा के माध्यम से एक प्रयास है। देश के माध्यम से अधिकतम समर्थन पाकर, कुछ करने का वास्तविक प्रयास है। इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी मामले में जिसमें बिल्कुल भी सहमति न हो, उसकी राय का परित्याग कर दें अथवा किसी अन्य के निर्णय के आगे घुटने टेक दें। यदि उसका किसी बात में विश्वास है, तो कोई भी व्यक्ति इस सभा के किसी सदस्य से ऐसी अपेक्षा नहीं रखता।
परन्तु लोकतांत्रिक प्रक्रिया का यह सार है कि हम किसी विषय पर वाद-विवाद करें और विचार करें तथा एक-दूसरे के दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए परस्पर सहमति पैदा करें। परन्तु किसी निर्णय पर पहुंचने के लिए कभी-कभी किसी बात को छोड़ना पड़ सकता है, जिससे अधिक लोगों की सहमति के साथ उस निर्णय को लागू किया जा सके। यही प्रक्रिया है। मैं सभा से अनुरोध करता हूँ कि इस महत्वपूर्ण मामले में भी हमको यही प्रक्रिया अपनानी चाहिए।
मैं नहीं चाहता कि सभा को जरा-सा भी संदेह हो कि हम ऐसा सोचते हैं कि हिंदू संहिता विधेयक अधिक महत्व का नहीं है, क्योंकि हम इसको बहुत अधिक महत्व देते हैं जैसे कि मैंने कहा, इसका कारण कोई खंड विशेष या कोई अन्य बात नहीं है, बल्कि इस देश में व्याप्त इस व्यापक समस्या के प्रति आधारभूत दृष्टिकोण के कारण है, जो आर्थिक और सामाजिक समस्याओं से सम्बद्ध है। हमने इस देश में राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की है। यह यात्रा का पहला पड़ाव है और इस यात्रा के अन्य पड़ाव भी हैं, जैसे आर्थिक, सामाजिक तथा अन्य। और यदि समाज को प्रगति करनी है तो सर्वांगीण विकास होना चाहिए। यदि एक दिशा में प्रगति हुई तो और अन्य दिशाओं में हम पिछड़े रहे, तो उसका अर्थ होगा कि हम ठीक से काम नहीं कर रहे और इसका यह भी अर्थ है कि एक दशा में हुई प्रगति खतरे में है। इसलिये हमको इस मामले पर इसी दृष्टि से विचार करना चाहिए कि हम किस प्रकार सभी दिशाओं में प्रगति कर सकते हैं। इस बात को सदा ध्यान में रखते हुए, निःसंदेह कि प्रगति से तालमेल स्थापित किया गया है और बड़ी संख्या में जनता का अनुमोदन मिलता है। मैं ऐसा इसलिये कहता हूँ, क्योंंक अन्ततः हम एक लोकतंत्रीय सभा के रूप में काम करते हैं और हम भारत की जनता के प्रति जवाब-देह हैं और हमें उनको लेकर चलना चाहिए। इस बात को ध्यान में रखते हुए हमारे लिये और इस सभा के लिये यह उचित नहीं होगा कि मात्र हम नेतृत्व करें। हमें नेतृत्व करना है और हमें नेतृत्व प्रदान करना है और ऐसा करते हुए हमें अन्य लोगों का विश्वास प्राप्त करना है और हम इस मामले में तथा अन्य मामलों में नेतृत्व प्रदान करने का प्रस्ताव करते हैं और हम यह कार्य लोगों को विश्वास में लेकर उनके सहयोग से करेंगे।
अतः यह प्रक्रिया है, जिसको मैंने विस्तारपूर्वक बताया है। अब हमें इस विचारार्थ प्रस्ताव को स्वीकार करके चर्चा के इस चरण को समाप्त करना होगा और फिर सभा सरकार को अनौपचारिक कदम उठाने की अनुमति देगी, जिसका मैंने विभिन्न भागों और खंडों के बारे में विचार-विमर्श का संकेत दिया है। यह काम आरम्भ हो जाना चाहिए ताकि जब यह