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रिपोर्ट मेरे पास है। यदि आप यह देखें कि समिति के सदस्य कहां-कहां गये थे, उन्होंने क्या किया और उन्होंने कौन-कौन से साक्ष्य रिकार्ड किये, तब आपको विदित होगा कि समिति ने कुछ समृद्ध और शिक्षित व्यक्तियों के ही मत एकत्र किये थे। उन्होंने देश के अधिकांश भागों के अभिमत इकट्ठे नहीं किये थे। यों इसमें शिक्षा का कोई प्रश्न ही नहीं है। इस विधेयक के लिए प्रत्येक माता और पिता, अपने उत्तरदायित्वों को पूर्णतः महसूस करते हैं, अपना अभिमत दे सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति जो इस विधेयक के द्वारा प्रभावित होता है और इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपना मत देने में सक्षम है। इसके अलावा मैं यह निवेदन करना चाहूँगा कि किसी को उन परिवर्तनों का ज्ञान नहीं है, जो प्रवर समिति ने मूल विधेयक में किये हैं। केवल विधानसभा के सदस्य ही इन परिवर्तनों के बारे में जानकारी रखते हैं। शेष व्यक्ति भी नहीं जानते कि प्रवर समिति ने क्या परिवर्तन किये हैं। अब प्रश्न उठता है कि प्रवर समिति ने इस विधेयक में परिवर्तन किये हैं, अतः इस विधेयक का व्यापक प्रचार अति आवश्यक है। पुराने प्रश्न को एक तरफ हटा दीजिये कि कोई भी कानून लोगों के पुराने रीति-रिवाजों में तत्काल परिवर्तन करने के लिए न बनाया जाये तब तक कि अधिकांश लोग जो ऐसे विधेयक द्वारा प्रभावित होते हैं, उनका अभिमत न जान लिया जाये। आज जो विधेयक प्रस्तुत किया जा रहा है, वह ऐसा विधेयक है जिसमें चयन समिति ने ऐसे परिवर्तन किये हैं जो अधिक महत्व के हैं और जिसके बारे में प्रत्येक व्यक्ति को पूरी जानकारी होनी चाहिये। इसी कारण से इसका व्यापक प्रचार भी अति आवश्यक है। इससे पूर्व कि इन परिवर्तनों के बारे में कुछ कहूं मैं एक बात की ओर इस सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ और मुझे यह बताने का खेद है कि विधि विभाग ही, जिसका अपना नाम ‘विधि विभाग’ है और जो कानून से भी पूर्णतया अवगत है, वही कानून का आदर नहीं करता। जब कानूनी लोग स्वयं ऐसी प्रक्रिया स्थापित करते हैं, जो उन्हें स्थापित नहीं करनी चाहिये, तो मुझे यह कहना होगा।
मैं उस प्रश्न के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता, जिस पर आपसे पहले के उपाध्यक्ष ने निर्णय दिया है। चूँकि इस प्रश्न का निर्णय हो चुका है, वह विनिर्णय मेरे लिए अन्तिम है। मैं उसके बारे में प्रश्न नहीं करता मैं उस विनिर्णय का आदर करता हूँ, यद्यपि मैं यह जानता हूँ कि मेरे मत के अनुसार वह विनिर्णय सही नहीं था। फिर भी मैं इस बारे में प्रश्न नहीं करना चाहता।
श्री तजामुल हुसेनः सदन के भीतर कोई भी व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि अध्यक्ष का विनिर्णय गलत है।
माननीय उपाध्यक्षः मुझे खेद है कि माननीय सदस्य ने श्री भार्गव को बिल्कुल ही नहीं समझा है। वे यह कहते हैं कि उनकी विनिर्णय के साथ सहमति नहीं है, परन्तु वे उस विनिर्णय का प्रश्न यहां नहीं उठाना चाहते। प्रत्येक सदस्य के लिए यह खुली छूट है कि वह स्वयं विचार करे और यह भी कहे कि वह इस मत को स्वीकार नहीं