हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 31

16 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

करता। फिर भी वह उस निर्णय से बाध्य है, तो मैं समझता हूँ कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

पंडित ठाकुर दास भार्गवः मुझे इस बात का बेहद दुख है कि जब कभी मेरे माननीय दोस्त तजामुल हुसेन व्यवस्था का कोई प्रश्न उठाते हैं, तो वह प्रश्न एक मिनट के लिए भी नहीं ठहरता। मैं चाहता हूँ कि वह व्यवस्था का ऐसा प्रश्न उठायें जिसका मैं उत्तर दे सकूं। मैं जानता हूँ कि इस समय वे किसी मान्य सदस्य से पूछताछ कर रहे हैं कि क्या यह विधेयक भू-सम्पत्ति पर लागू होता है अथवा नहीं। परन्तु वह यह दिखावा करते हैं और कहते हैं कि वह इस संहिता-विधेयक को समझते हैं। अतः मैं यह तब निवेदन करना चाहता हूँ कि मैं पूर्णतया ऐसा अधिकार रखता हूँ कि ऐसे विनिर्णय पर मेरा अलग मत है। मैं यह निवेदन करना चाहता हूँ कि कुछ ऐसे अन्य आधारभूत सिद्धांतों की बात करूं, जिनके संबंध में माननीय अध्यक्ष के विनिर्णय में किसी प्रकार का कोई उल्लेख नहीं है। अति विनम्र भाव से मैं सदन का ध्यान विशेष रूप से इस तथ्य की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ कि यह सदन जो संविधान बनाने वाला सदन है, अपने ही कानूनों का स्वामी भी है। हमारे मामलों में से किसी को देश के किसी न्यायालय में नहीं उठाया जा सकता। यदि यह सदन कुछ अधिनियम पारित करने के लिए अपने ही सिद्धांतों का परित्याग करता है, तो हम ऐसी भूल करते हैं कि हम अपने दायित्वों से उत्रृण नहीं हो सकते। मैं सविनय कहना चाहता हूँ कि इस दुबारा तैयार किये गये विधेयक में जैसा कि प्रवर समिति द्वारा बताया गया है, जो भूलें वहां हमने की हैं, जो तीन प्रकार की हैं। पहली जब कोई विधेयक सदन के समक्ष आता है तो वह सदन के अधिकार में हो जाता है। सदन में पेश होने पर इसके बाद सदन के सिवाय, सदन का कोई सदस्य, चाहे वह कितना ही बड़ा या अच्छा क्यों न हो, उस विधेयक में जब तक कि सदन की अनुमति न हो, एक अर्ध विराम भी परिवर्तित नहीं कर सकता। यदि किसी प्रकार से किसी लिपिक की भूल हो जाती है, तो यह दूसरी बात है। और यदि किसी प्रकार की सामग्रीगत् भूल है, तो उसे फिर से मुद्रित किया जायेगा और उसका प्रचार किया जायेगा तथा इसके बाद सदन के समक्ष प्रस्तुत किये जाने के बाद किसी समिति को विचारार्थ भेजा जा सकता है। श्रीमान, अति विनम्र भाव से मेरा निवेदन है कि मैं दो या तीन बातें आपके विचारार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ। इन बातों के संबंध में मैं अन्य मान्य सदस्यों के समक्ष विनम्र भाव से यह निवेदन करना चाहूँगा, परन्तु इसमें डॉ. अम्बेडकर सम्मिलित नहीं हैं क्योंकि वे तकनीकी नियमों और वस्तुओं से परिचित हैं तथा वे जानते हैं कि इन तकनीकी नियमों को छोड़ देने से कितना अन्याय हो सकता है। इसलिए मैं यह निवेदन कर रहा था कि उन तकनीकी नियमों के त्यागने से अन्याय और अवैधानिक बातों के अलावा ऐसा कुछ भी नहीं मिल सकेगा, जो लाभकारी हो। श्री ओस्लो, हाउस ऑफ कॉमन्स के अत्यंत प्रसिद्ध अध्यक्ष हुए हैं। उन्होंने यह बताया था कि तकनीकी नियमों का उल्लंघन करके कोई कार्य नहीं किया जाना चाहिये। अल्प-संख्यकों की सुरक्षा, सदन की समग्रतः सुरक्षा के संबंध में तकनीकी नियम हैं और ये नियम ऐसे