(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 305

290 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं यह कह रहा था कि विधेयक के पांच भागों का लगभग कोई विरोध नहीं किया गया। मैंने विवाह, संयुक्त परिवार सम्पत्ति और इच्छापत्रहीन उत्तराधिकार से सम्बन्धित तीन भागों के सम्बन्ध में, इस व्यवस्था का विरोध करने वाले सदस्यों के दृष्टिकोण को जितना मैंने समझ पाया है मैंने देखा है कि उनका विरोध उन पूरे भागों का नहीं, बल्कि कुछ मुद्दों पर केंद्रित था। विवाह के सम्बन्ध में, मैंने पाया कि उनका विरोध विवाह-विच्छेद को लेकर है। संयुक्त परिवार के सम्बन्ध में यह विरोध उत्तराजीविता के नियम पर केंद्रित है और इच्छापत्रहीन उत्तराधिकार के सम्बन्धों में उनका विरोध पुत्री के हिस्से पर संकेन्द्रित है। इसलिये यदि मुझे चर्चा का पूरा उत्तर देना है और इस विधेयक का विरोध करने वालों के तर्कों का उत्तर देना है, तो मैं अपने आपको इन तीन मामलों अर्थात् विवाह-विच्छेद, उत्तरजीविता के नियम और पुत्री के हिस्से तक सीमित रखूंगा। मैं कह सकता हूँ कि मैंने विधेयक के लिये पूरी तैयारी की हुई है। परन्तु माननीय प्रधानमंत्री द्वारा दिये गये वक्तव्य को देखते हुए, मैं अब किसी विवाद में पड़ना अनावश्यक समझता हूँ। मैं माननीय प्रधानमंत्री द्वारा दिये गये सुझाव का स्वागत करता हूँ और मैं उनके द्वारा दिये गये सुझाव को उसकी पूरी सीमा तक पहुँचाने का वचन देता हूँ। परिणामस्वरूप मैं इस स्थिति में इन सभी बातों का विस्तृत उत्तर नहीं दे रहा। महोदय, जैसा कि आपने सुझाव दिया है, मैं भी अपने उत्तर को बाद में ही देने के लिये सुरक्षित रखता हूँ।

यहाँ केवल एक ही मुद्दा है, जिसके विषय में कुछ कहना आवश्यक समझता हूँ, जिससे सभा को देश में व्याप्त स्थिति की जानकारी मिल सके। इस बात को ध्यान में रखना होगा कि भारत को एक राज्य और एक गणतंत्र का रूप दिये जाने के परिणामस्वरूप इसके राज्य क्षेत्र में हिंदू विधान से सम्बन्धित अनेक संहिताएं आ गयी हैं। एक बड़ौदा राज्य है, जिसकी अपनी हिंदू संहिता है जो भारत के प्रांतों में प्रचलित हिंदू विधान से भिन्न है। अब वह राज्य बम्बई प्रांत का अंग बन गया है। इसी प्रकार ट्रावनकोर और कोचीन, जो भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अधीन भारत की राज्यक्षेत्र सीमा तथा प्रभुत्व के बाहर थे, अब भारत के अंग बन गये हैं। मैसूर में सम्पत्ति पर महिलाओं के अधिकार के विषय पर अपनी हिंदू संहिता है, जो अंग्रेजों के भारत के प्रांतों में प्रचलित विधि से बिल्कुल भिन्न है, वह भी भारत का अंग बन गया है। इसलिये 26 जनवरी, 1950 को जब गणतंत्र में प्रवेश करेंगे हिंदू विधान की अनेक भिन्न-भिन्न प्रणालियां हमारे सामने होंगी जिनका बेहतरीन तरीके से समन्वय करना बहुत ही आवश्यक होगा। यह कैसे सम्भव होगा? उदाहरणार्थ बम्बई प्रांत में प्रशासन चलाने के लिये हिंदू विधान की दो प्रणालियां होंगी, एक जो बड़ौदा की सीमा के अन्दर प्रचलित होगी और एक शेष प्रान्त में प्रचलित होगी जबकि दोनों राज्य क्षेत्र एक ही देश के एक राज्य के अंग बन चुके हैं। यही स्थिति अन्य राज्य क्षेत्रों के बारे में भी होगी। उदाहरण के लिये कल्पना कीजिए, भारत के कुछ भाग, पुर्तगाल या फ्रांस के प्रभुत्व में हैं, और जिनके बारे में हमें आशा है कि हम उनको अपने अधीन ले आयेंगे। पर वहां भी हिंदू विधान की प्रणालियां भिन्न-भिन्न हैं, लेकिन जब वे भाग हमारे पास आ जाएंगे तो भी वही समस्याएँ हमारे सामने