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आएँगी। पर उस कानून का क्या होगा जो गोआ के हिंदू अपने साथ लाएंगे? क्या हम उनको अपना कानून जारी रखने की अनुमति देंगे? क्या हम वही कानून लागू करेंगे जो उन पर उस समय लागू होता है? अथवा हम कानून की एक ऐसी प्रणाली विकसित कर रहे हैं जो दोनों को स्वीकार्य हो? इसलिये भारत की अखंडता के हित में, हमें हिंदू विधान में परिवर्तन और संहिताकरण की समस्या से शीघ्रातिशीघ्र निपटना होगा और मैं सभा को सुझाव देना चाहता हूँ कि यह एक ऐसी समस्या है जिसको यदि हम चाहते हैं कि विभिन्न प्रकार के लोगों में, जो आयेंगे और आकर भारतीय गणतंत्र के नागरिक बनेंगे, समरसता बनी रहे तो न इसे स्थगित किया जा सकता है और न ही इससे बचा जा सकता है।
डॉ. बी. पट्टाभि सीतारमैयाः संहिताकरण स्वीकार कर लिया गया है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, मैं सभा का ध्यान एक और मुद्दे की ओर दिलाना चाहता हूँ जो मुझे बहुत महत्वपूर्ण प्रतीत होता है। सभा, विशेषकर वे लोग जो इस विधेयक का विरोध करने में जुटे हैं, भारत के संविधान जिसको हमने हाल ही में पारित किया है के अनुच्छेद 15 में उल्लिखित उपबंधों को बिल्कुल भूल गये प्रतीत होते हैं, जिसमें मूल अधिकारों के अंतर्गत निश्चित और स्पष्ट शब्दों में लिखा हैःµ
फ्राज्य किसी नागरिक के साथ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या उनमें से किसी एक आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।य्
जिस किसी व्यक्ति ने हिंदू विधान को ध्यानपूर्वक पढ़ा है, वह स्वीकार करेगा कि हिंदू विधान में अनेक दोषों के अतिरिक्त कुछ ऐसे सिद्धांत हैं जो स्वर्ण जातियों और शूद्र जातियों में भेदभाव करते हैं। वे पुरुष हिंदू और महिला हिंदू के बीच भी भेदभाव करते हैं।
श्री महावीर त्यागीः हिंदू और मुसलमान में भी।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः अतः यह बिल्कुल स्पष्ट है कि हिंदू विधान के कुछ भागों और संविधान के उपबंधों का परस्पर विरोध रहेगा। परन्तु यह तो बहुत कम कहना है। इससे आगे भी विचार करना है। ऐसा नहीं है कि अनुच्छेद 15 में लगाई गई पाबन्दियां आगामी विधियों, जो संसद तथा विधान परिषदों द्वारा बनायी जायेंगी, पर भी लागू होंगी। संविधान में इसे आगे और भी लिखा है और अनुच्छेद 13 में जिसे मैं सभा को पढ़कर सुनाना चाहता हूँ, लिखा है फ्भारत के राज्य क्षेत्र में इस संविधान के प्रारम्भ से तत्काल पूर्व प्रवर्तन में सभी विधियां, जहां तक वे इस भाग में उपबंधों से असंगत है, असंगति होने की सीमा तक रद्द हो जायेंगी।य्
इसलिये एक वकील की दृष्टि से देखते हुए, मुझे इस बात में बिल्कुल संदेह नहीं है कि जब तक हिंदू विधान को संहिताबद्ध नहीं किया जायेगा, बल्कि उसको अनुच्छेद 15 के उपबंधों के अनुरूप बदला नहीं जायेगा, अनुच्छेद 13 की दृष्टि से न्यायपालिका हिंदू